रविवार, 16 अगस्त 2009

मेरी चार लाइनें( पूरी रचना आनी अभी बाकी है।)

आज तेरे सामने, जो मिट्टी में लोट रहा।
वही कृष्ण कल,पूतना का काल हो सकता है।

न तेरा हरा है, न मेरा केसरिया होगा।
लहू का रंग तो, केवल लाल हो सकता है।

12 टिप्‍पणियां:

  1. जब पहली चार लाइन इतनी जानदार है तो बाकी का क्या होगा...
    अच्छा आगाज़ है.. स्वागत !

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  2. आप हिन्दी में लिखते हैं. अच्छा लगता है. मेरी शुभकामनाऐं आपके साथ हैं स्वागत है चिटठा जगत में.

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  3. ‘न तेरा हरा है, न मेरा केसरिया होगा।
    लहू का रंग तो, केवल लाल हो सकता है।’

    बेहतरीन पंक्तियां....

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  4. बाकी कविता आना है....तो अभी से चेतावनी :)

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  5. Bahut Barhia...Isi Tarah likhte rahiye...

    http://hellomithilaa.blogspot.com
    Mithilak Gap... Maithili Me

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    Manpasand Gaane

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  6. आप की रचना प्रशंसा के योग्य है . आशा है आप अपने विचारो से हिंदी जगत को बहुत आगे ले जायंगे
    लिखते रहिये
    चिटठा जगत मे आप का स्वागत है
    गार्गी

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  7. चिटठा जगत में आपका स्वागत है.
    ---
    उम्मीद करते हैं कि आप अपनी कलम से अपना नाम ही नहीं हमारे समाज और देश के कई अनगिनत पहलुओं को भी कमा ले जाएंगे. शुक्रिया. जारी रहिये.
    --
    देश भक्ति के भावः को दीजिये शब्द "एक चिट्ठी देश के नाम लिखकर" कहिये देश को अपनी बात- विजिट करें- [उल्टा तीर] http://ultateer.blogspot.com
    ---
    अमित के सागर

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  8. डरते डरते यह ब्लॉग बनाया,कुछ पोस्ट लिखीं,चिठ्ठाजगत से लिंक किया.....और वाह मुझे १० कमेन्ट भी मिल गये.. धन्य हो इन्टरनेट तेरी महिमा अपरम्पार....

    मेरे उत्साह वर्धन के लिये शुक्रिया....

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  9. आगाज बेहतरीन...आगे बढा़ओ!!

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