रविवार, 30 अगस्त 2009

मोहम्मद इकराम कुरैशी़ की दुकान पर दोबारा.........

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बहुत सालों बाद इस बार गया, अपने पुराने शहर...
रक्षाबंधन पर हर साल पानी बरसता है मेरे शहर में...
थोड़ी देर ही सही,पर परंपरा निभाई बादलों ने इस बार भी...
सुबह थोड़ी देर बरसा, फिर खुल गया आसमान...
और इसी के साथ उड़ने लगीं खूब सारी रंग बिरंगी पतंगें...
पतंग उड़ाते बच्चों को देख जाग गई सब पुरानी यादें...
तभी अनायास याद आ गया अपना 'इक्कू मोटा'...
घर से निकला आज मिल कर आउंगा उसकी दुकान पर...



हाँ, पूरा नाम था उसका, मोहम्मद इकराम कुरैशी़...
साथ साथ पड़ते थे हम शहर के सरकारी स्कूल में...
उतना मोटा तो नहीं था,पर हम सब में तगड़ा था...
उसी की वजह से बड़े रौब से चलते थे हम सब...
जब 'इक्कू मोटा' साथ होता,पिटते कम,पीटते ज्यादा...
पढ़ाई में तो ज्यादा मन नहीं ही लगता था उसका...
मगर उसके जैसा खिलाड़ी,नहीं देखा मैंने आज तक...
खेल कोई भी हो,उस्ताद था वो सभी खेलों का...
कंचे खेलता जीत ले जाता हम सबके सारे कंचे...
क्रिकेट में बाउन्ड्री के पचासों गज बाहर गिरते उसके शॉट...
फुटबाल तो मानो चिपक जाती थी पैर से 'इक्कू' के...
मेरी याद्दाश्त में कैरम में भी नहीं कोई जीत पाया उससे...



पर इन सबसे बढ़कर उसकी पतंगबाजी याद है मुझे...
इधर इक्कू मोटे की पतंग उड़ी तो लोग उतार लेते थे अपनी...
मांझे,सद्दी और पतंग से मानो एकाकार हो जाता था वो...
चील सा झपट्टा मारती उसकी पतंग,जब तक कुछ समझ आये...
'वो काट्टा'चिल्लाते हुए नाच रहा होता हमारा 'इक्कू मोटा'...
उसकी पतंग उड़ने के थोड़ी देर बाद साफ हो जाता आसमान...
'है कोई और'चुनौती देती उड़ती रहती सिर्फ उसी की पतंग...



भीड़ से बचता बचाता जब पहुंचा उस की दुकान पर...
काउंटर पर बैठा मछली साफ कर तौल रहा था वो...
'अबे साले इक्कू' की जगह बोला "कैसे हो इकराम भाई"...
'स्साले पॉन्डी तेरी तो'की जगह वो बोला"कैसे हो साहब"...
"साहब होंउगा दूसरों का, तुम्हारे साथ तो खेला हूँ मैं"...
"अरे नहीं,फिर भी आपकी इज्जत का लिहाज रखना होता है"...
मैंने मिलाने को हाथ बढ़ाया काउंटर के उस पार...
कलाई थमा दी उसने,बोला हाथ गंदे हो जायेंगे आपके...
आज राखी के दिन भी पतंग नहीं उड़ाओगे? पूछा मैंने...
अब हमारे दिन कहां? बेटा गया है आज उड़ाने, बोला वो...
शुगर बढ़ी रहती है इन्सुलिन से भी काबू नहीं,बतलाया उसने...
थोड़ी देर कुछ इधर उधर की बातें की,उसने चाय पिलाई मुझे...



"अच्छा भाई चलता हूँ फिर आउंगा कभी" बोलकर विदा ली मैंने...
मेरी स्मृतियों के आइने में कहीं कुछ चटख गया उस रोज...



अब दोबारा कभी नहीं जाउंगा, मोहम्मद इकराम कुरैशी़ की दुकान पर...
मैं अपनी यादों के 'इक्कू मोटे' को, रखना चाहता हूँ जस का तस...

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

पापा क्या आपके बॉस को नहीं पता..

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मंदी के इस भयावह दौर में
टारगेट पूरे करने और नौकरी बचाने की जद्दोजहद में
रोजाना रात नौ बजे घर पहुंचता हूँ मैं
नहीं मिली एक महीने से कोई छुट्टी
इतवार या त्यौहार की भी नहीं

रोजाना सुबह स्कूल जाने से पहले
कह कर जाती है मेरी बिटिया
पापा जरूर अपने बॉस को कहना
जल्दी घर जाना है आज मुझे
आप आफिस से जल्दी आओगे
तो पहले हन दोनों चलेंगे कालोनी के पार्क
खूब खेलूंगी जहां मैं आपके साथ
फिर आप मैं और मम्मी जायेंगे बाजार
मैं तो ढेर सारी आइसक्रीम खाउंगी
रात का खाना खायेंगे घर से बाहर
इस तरह खूब मजा करेंगे हम लोग

रोज उसे प्रॉमिस करके निकलता हूं घर से
पिस जाता हूँ काम की चक्की में फिर से
थका हारा पहुंचता हूँ वही रात नौ बजे
सोने की तैयारी कर रही होती है मेरी बेटी
बहुत गुस्सा दिखाती है बड़ा मुंह फुलाती है
पापा आज मैं आप से एकदम कुट्टा हूं
उसे मनाता हूं सुलाता हूं खुद भी सोता हूं
उसके बचपन की खुशियों को रोजाना खोता हूं

आज एक बार फिर देर से पहुंचा मैं घर
बिल्कुल नाराज नहीं हुई वो न मुंह फुलाया
मेरी पीठ पर चढ़ी बांहौं में लपेटा मुझको
बार बार चूमा मेरे सिर, गर्दन और चेहरे को
फिर फुसफुसाते हुए कान में किया वो सवाल
पापा क्या आपके बॉस को इतना भी नहीं पता?
कि घर में सोना आपका इंतजार करती है

नि:शब्द निरुत्तर हूँ मैं
समझाने या दुलारने की हिम्मत नहीं मुझमें
काश.....
सारी दुनिया के ये 'बॉस' लोग सुन पाते
मेरी छोटी सी बिटिया का ये बड़ा सवाल...
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बुधवार, 26 अगस्त 2009

लो उतर आईं आखिरी चार लाईनें भी...

मेरा मानना है कि हर शख्स के भीतर अनेकों कवितायें होती हैं बस मुश्किल होता है उनका कागज पर उतरना....
तो ये हैं अंतिम चार लाइनें..



चुप रहना सीख ले,या झूठ को दे सम्मान ,
लोक तंत्र में सच बोलने, पर बवाल हो सकता है।


बतला तो तुम रहे हो,पर नहीं मुझे यकीं,
इस नाचीज का उनको,इतना ख्याल हो सकता है।

रविवार, 23 अगस्त 2009

चार लाइनें.और भी..

ये वो हंगामा नहीं, बदल डाले जो दुनिया को,

बासी कढ़ी में आया,नया उबाल हो सकता है।



अभी भी देर नहीं हुई, कद्र हमारी जान लो,

वरना इस चूक का ,तुम्हें मलाल हो सकता है।

चार और लाइनें...

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मजबूती से थमा गिलास, फिसल कर बिखर गया,
ऐसा तो सिर्फ उन्हीं, निगाहों का कमाल हो सकता है।

तूने गौर से देखा था? मेरे मेहबूब के माथे को..
सिंदूर तो नहीं ही होगा , गुलाल हो सकता है।

रविवार, 16 अगस्त 2009

मेरी चार लाइनें( पूरी रचना आनी अभी बाकी है।)

आज तेरे सामने, जो मिट्टी में लोट रहा।
वही कृष्ण कल,पूतना का काल हो सकता है।

न तेरा हरा है, न मेरा केसरिया होगा।
लहू का रंग तो, केवल लाल हो सकता है।