बुधवार, 30 दिसंबर 2009

चुल-बुल, बुल-बुल... बुल-बुल, चुल-बुल . . . . . . . . . . प्रवीण शाह.

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गुजर रहा था शहर के एक पुराने मौहल्ले से, देखा एक जगह गली सजी है... बहुत से फूल बिखरे हैं...रात बारात आई थी यहां... सुबह शायद किसी बिटिया की विदाई हुई है... अचानक नजर पड़ी एक किनारे पड़े मुड़े-तुड़े कागज पर...कोई खत सा लगता था...उत्सुकता बढ़ी... चुपके से उठाकर जेब में रख लाया साथ... अब खोला है... एक चिठ्ठी सी है... शायद पिता ने लिखी है अपनी बिटिया को देने के लिये... बेचारा बाप... देने की हिम्मत कर न सका... अब आप बांचिये इसे, मेरे साथ साथ...




चुल-बुल, बुल-बुल
अपने अब हो गये पराये
चल दी आज तू दूजे कुल


बुल-बुल, चुल-बुल
फिक्र यहां की करना मत
रहना सब से मिल-जुल


चुल-बुल, बुल-बुल
चीनी जैसे पानी में
जाना वहां तू सबमें घुल


बुल-बुल, चुल-बुल
गलत बात गर करे जो कोई
डरना मत तू बिल-कुल


चुल-बुल, बुल-बुल
न्याय पक्ष पर अड़ जाना
तनिक न करना ढुल-मुल


बुल-बुल, चुल-बुल
झूठे को होगा पछताना
जब जायेगा भेद खुल


चुल-बुल, बुल-बुल
बाप तेरा आज रोया नहीं
गई पसीने से लिखाई धुल


बुल-बुल, चुल-बुल
जाकर तूने है बनाना बिटिया
रिश्तों का एक नया पुल



चुल-बुल, बुल-बुल
बुल-बुल, चुल-बुल
चुल-बुल, बुल-बुल
बुल-बुल, चुल-बुल......



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गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

कौव्वों की बलि और उनके खून सनी 'सोने' की तलवार, दलितों के साथ भेदभाव और कंदास्वामी . . . (Past life regression) . . . . . . . . .प्रवीण शाह.

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मेरे जन्म जन्मांतर के मित्रों,

बहुत दिनों से सोच रहा था कि देखूंगा "राज पिछले जन्म का" पर समय नहीं मिल पा रहा था, कल देखा और जो देखा वह यह था:-

यह जनाब डॉ० संजय गायकवाड़ नाम से जाने जाते हैं इन्हें कौव्वों से बहुत डर लगता है, लगता है कि कौव्वे इनको परेशान कर रहे हैं और दूसरी शिकायत इनकी यह है कि जब भी यह किसी स्त्री के प्रति कोई अच्छा काम करते हैं वह इसे उल्टे रूप में लेती है, अर्थात जीवन में आई स्त्रियों को या तो जनाब समझ नहीं पाते या इनकी उनसे पटती नहीं।

अब डॉ० तृप्ति जैन के साथ सेशन शुरु होता है...

आज से ७००-८०० साल पहले मंगलौर के पास मंगला देवी के मंदिर में पुजारी हैं जनाब... नाम है 'कंदास्वामी'... विक्रमादित्य राजा है देश का... मंत्र पढ़ने में मन नहीं लगाते तो क्रोधी पिता( जो स्वयं भी पुजारी हैं। )श्राप देते हैं " जा तू अगले जनम में untouchable (दलित) बन जा!"... खैर इस श्राप को ज्यादा explore नहीं किया गया... मंदिर में ही एक और पुजारी है 'धुत'... वह कौव्वों की बलि देता है... क्योंकि कौव्वों का खून लगने से तलवार 'सोने' की हो जाती है... और 'सोने' की इस तलवार से शत्रुओं को आसानी से मारा जा सकता है... कंदास्वामी (डॉ० संजय गायकवाड़)चाह कर भी अपनी जान के डर से कौव्वों की हत्या को नहीं रोक पाते... एक दलित युवती भी है 'सुन्दरा'... जो कंदास्वामी के पूजा करते या मंत्रजाप करते समय आकर उनको परेशान करती है... दलितों का मंदिर के अंदर प्रवेश वर्जित है उस काल में... एक दिन 'धुत' सुन्दरा को कंदास्वामी के साथ मंदिर के अंदर देख लेता है...और इस अपराध की सजा के तौर पर कंदास्वामी को सुन्दरा को मार डालने को कहता है... कंदास्वामी के मना कर देने पर 'धुत' अपनी तलवार से सुन्दरा को मार देता है...

अब दो श्राप दिये जाते हैं:-
-सुन्दरा की बेबात हत्या किये जाने के कारण कंदास्वामी धुत को कौव्वा बन जाने का श्राप देते हैं।
-अपनी आंखों के सामने हत्या होती देख भी रोकने का प्रयत्न न करने के कारण 'सुन्दरा' कंदास्वामी (डॉ० संजय गायकवाड़) को श्राप देती है कि जब भी तुम किसी स्त्री के साथ कुछ अच्छा करोगे उसका उल्टा हो जायेगा या वह इसे उल्टे रूप में लेगी।

अब डॉ० तृप्ति जैन १-२-३ गिनती हैं और 'कंदास्वामी' ९० वर्ष के होकर एक गुफा में हैं जहाँ पर कौव्वा बना 'धुत' उन्हें परेशान कर रहा है।

सेशन खतम, अब Analysis होता है कि कौव्वा बना 'धुत' और वे कौव्वे जिनकी बलि होने को 'कंदास्वामी' नहीं रोक पाये... आज के डॉ० संजय गायकवाड़ के कौव्वों से डरने का कारण हैं और इसी तरह जीवन में आने वाली स्त्रियों से डॉ० संजय गायकवाड़ का Adjustment न हो पाने का कारण 'सुन्दरा' का वह श्राप है।

अंत में डॉ० तृप्ति जैन डॉ० संजय गायकवाड़ को इन घटनाओं के पिछले जन्म में घटने का हवाला देते हुऐ इस जन्म में उनसे प्रभावित न होने को कहती हैं और डॉ० संजय गायकवाड़ हाथ जोड़ कर उन सभी ज्ञात-अज्ञात आत्माओं से माफी मांगते हैं जिनके साथ पूर्व जन्म में उन्होने कुछ गलत किया था।


अब यहाँ देखिये क्या कहते हैं विशेषज्ञ इस शो के बारे में...

जयश्री रामदास, डीन, होमीभाभा सेन्टर फॉर साइन्स एजुकेशन...
“When India is trying to be scientific and development-oriented, a show like this is highly regressive, perpetuating superstition while playing on peoples’ vulnerabilities, So-called past life regression through hypnotism has been tested and debunked, and besides, it has dangers.From watching the show for fun, many will start believing it, and it may take hold of their lives, leading to trouble for them and their families.”

डॉ० युसुफ मैचेसवाला, मनोरोग विशेषज्ञ...
“Science has not been able to establish that we have a past life. Psychologists and psychiatrists do not accept it either,The concept of a past life is more of a cultural and religious belief. An unconscious mind can go to any limits. One’s thoughts could also be based on what’s read in history.”


सनत एडमारूकु, अध्यक्ष, रैशनलिस्ट सोसाइटी ऑफ इन्डिया...
In a country where many believe in reincarnation, academicians and rational thinkers feel that the show will reinforce such beliefs. “The show tries to prove to the gullible masses that all their physical and mental problems are derived from their past lives,”

पास्ट लाइफ रिग्रेशन के बारे में आप यहां पर और जानकारी पा सकते हैं।

पास्ट लाइफ रिग्रेशन के बारे में मैं सिर्फ यही कहूंगा कि...

Past-life regression practitioners use hypnosis and suggestion to promote recall in their patients, using a series of questions designed to elicit statements and memories about the past life's history and identity.

यहां पर ध्यान देने योग्य शब्द हैं hypnosis और suggestion, कुछ लोग hypnotizable व्यक्तित्व के स्वामी होते हैं यही लोग सेशन के दौरान थेरेपिस्ट के दिये suggestion को मान लेते हैं और अपने व्यक्तिगत विश्वास और कल्पना के सहारे कहानी गढ़ने लगते हैं... और कंदास्वामी, धुत , सुन्दरा और कौव्वे जैसे चरित्र अनायास ही पैदा हो जाते हैं।

क्या ख्याल है आपका ?

चलते-चलते...

हाँ याद आया, मेरी पत्नी श्री भी छिपकलियों से जरूरत से ज्यादा ही डरती हैं, मुझे अखबार पड़ते हुऐ तो बिल्कुल भी नहीं देख सकती और टी० वी० पर किसी चैनल में शाहरूख खान के दर्शन हो रहे हों तो मजाल किसी की जो वहां से उनको एक पल भी हिला सके...

सोचिये दिमाग लगाईये ऐसी कोई कहानी बनाईये जो छिपकली, शाहरूख और अखबार से नफरत को पूर्वजन्म से जोड़ सके तो मैं भी पत्नी श्री से फोन करवाता हूँ "राज पिछले जन्म का" को...टी वी पर आना किसे खराब लगता है ?
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मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

वेश्यावृति का कानूनीकरण ( Legalization of Prostitution ) और इस से उठते कुछ अहम् सवाल . . . . . . . . . .प्रवीण शाह

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मेरे कानून पालक मित्रों,

अभी हाल में माननीय उच्चतम न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान वेश्यावृति के बारे में सरकार को सलाह दी:-
" When you say it is the world's oldest profession and when you are not able to curb it by laws, why don't you legalize it?" इसके आगे माननीय न्यायालय द्वारा कहा गया " You can then monitor the trade, rehabilitate and provide medical aid to those involved." (स्रोत-PTI)


"TIMES OF INDIA" में अपने कॉलम 'LEGALLY SPEAKING' मे धनंजय महापात्र ने इस पर असहमति जताते हुऐ लिखा है कि २० साल पुराने सख्त कानून के बावजूद भ्रष्टाचार में कोई कमी नहीं आ पाई है तो क्यों न सरकार भ्रष्टाचार को कानूनी जामा पहना दे और सरकारी सेवकों द्वारा ली जाने वाली घूस या कमीशन की दरें निर्धारित कर दे।

अब इसी तर्क को आगे बड़ाते हुऐ क्या यह नहीं हो सकता कि:-

- पुलिस और प्रशासन के राजनीतिकरण के विरूद्ध कड़े नियमों के बावजूद अधिकतर अधिकारी किसी एक राजनीतिक दल विशेष की विचारधारा को बढ़ाते है, उसके नेताओं की चमचागिरी करते हैं तथा अपने फैसलों से उस राजनीतिक दल का हित साधते हैं,... तो क्यों न जनता के इन सेवकों को राजनीतिक दल का सदस्य बनने दिया जाये।
- दहेज विरोधी कानूनों के होने के बावजूद यह खुले आम मांगा और दिया जाता है... क्यों न इसका रेट फिक्स कर दिया जाये?
- साम्प्रदायिक मुद्दों पर वोट मांगने की मनाही के बावजूद खुलेआम ऐसा होता है... क्यों न इसको कानूनी जामा पहना कर राजनीतिक दलों को उनके द्वारा उठाये साम्प्रदायिक मुद्दों का एकाधिकार दे दिया जाये।
- सरकारी और सार्वजनिक भूमि के अतिक्रमण (encroachment)के विरुद्ध तमाम कानूनों के बाद भी यह खुलेआम होता है... अपनी कॉलोनी में ही देखिये स्वयं आप ने, आप के पड़ोसी या दोस्त ने नाली के ऊपर निर्माण किया हुआ होगा या फुटपाथ के ऊपर कब्जा कर जेनरेटर रखा होगा/ पार्किंग बनाई होगी... धर्मस्थलों के लिये तो जमीन खरीदना पाप समझा जाता है... आखिर सरकारी जमीन है किसलिये... तो क्यों न अतिक्रमण करना हमारे अधिकारों में शामिल कर दिया जाये।
- भीख मांगना अपराध है पर भीख खुलेआम मांगी और दी जाती है... क्यों न इसे कानूनी रूप देकर इसमें निवेश, कमाई और रोजगार के अवसर पैदा किये जायें।

ऐसे और भी तमाम विषय और मुद्दे है... जो अपने Legalization की बाट जोह रहे हैं... बस मेरे,आपके और हम सबके समर्थन की दरकार है!

तो क्या खयाल है आपका ???

मंगलवार, 8 दिसंबर 2009

क्लाइमेटगेट ( CLIMATEGATE ) एक बहुत बड़ा धोखा है 'ग्लोबल वार्मिंग' और ' क्लाइमेट चेंज' पर कोपेनहेगेन वार्ता . . . . . . . . . . . . .प्रवीण शाह. . .

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मेरे पर्यावरणचिंतक मित्रों,

सबसे पहले बताता हूँ आपको 'क्लाईमेटगेट' के बारे में, अमेरिकी राष्ट्रपति निकसन के बदनाम 'वाटरगेट' की तर्ज पर 'क्लाईमेटगेट' कहा जा रहा है उस घटना को जिस में एक हैकर ने University of East Anglia’s Climate Research Unit (aka CRU) के कंप्यूटर सिस्टम को हैक कर के रिलीज कर दी 61 megabytes of confidential files onto the internet.

आप चाहें तो आप भी इन फाइलों को इस वैबसाइट से डाउनलोड कर इनका अध्ययन कर सकते हैं।

अब सवाल यह आता है कि है क्या इन 'क्लाइमेटगेट' पेपर्स में ?

इन पेपर्स से यह रहस्योद्घाटन होता है कि:-

जानबूझकर, डाटा को मैनिपुलेट करके व गलत डाटा के आधार पर 'ग्लोबल वार्मिंग' व 'क्लाइमेट चेन्ज' का एक हव्वा खड़ा किया जा रहा है जहाँ डाटा साथ नहीं दे रहा है वहाँ पर पूरी तरह से काल्पनिक डाटा पैदा किया जा रहा है।

फर्जी डाटा कैसे CREATE किया गया देखिये यहाँ पर...

आईये देखते हैं ग्लोबल वार्मिंग के बारें में हमारा वर्तमान ज्ञान क्या है

अब देखिये क्या कीमत चुकानी पड़ेगी इस हव्वे की

यह कीमत आ रही है ४५ ट्रिलियन यू० एस० डॉलर, सन २०५० तक।

अब देखिये कि अमेरिका का सम्मानित अखबार 'वाशिंगटन टाइम्स' इस सारे गड़बड़झाले के बारे में क्या लिखता है

संपादकीय नं० १
संपादकीय नं० २

स्पष्ट है कि दुनिया बजाय गर्म होने के ठंडी हो रही है लेकिन इस बारे में जानकारी छिपाई जा रही है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के वैज्ञानिक सलाहकार (President Obama’s science adviser) Dr. John P. Holdren ने भी इस गड़बड़ी को स्वीकार किया है देखिये यहाँ पर

अब सवाल यह आता है कि ऐसा क्यों किया जा रहा है...

कारण कई हैं...
१- विकासशील और गरीब देशों को उर्जा के सबसे सस्ते स्रोत यानी कोयले से उत्पन्न बिजली से वंचित रखने के लिये।
२- उनकी उर्जा की कीमत को बढ़ाने के लिये ताकि वो 'सीमा' से अधिक तरक्की न कर सकें।
३- अपनी महंगी ग्रीन टेकंनालाजी बेचने को।
४- शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद बेकार पड़े न्युक्लियर मटीरियल को क्लीन व ग्रीन न्यूक्लीयर उर्जा उत्पन्न करने के नाम पर उसके अच्छे दाम पाने को।
५- भूखे-गरीबों को भूखा गरीब बनाये रखने के लिये।


इस सारे प्रपंच को रचने के लिये कार्बन डाई आक्साईड को ग्लोबल वार्मिंग का जिम्मेदार ठहराया जा रहा है क्योंकि कोयला या अन्य ईंधन जलाने से यही गैस निकलती है। यहाँ देखिये ग्लोबल वार्मिंग CO2 के कारण नहीं होती और डाइनासोर युग मे् आज से ५ गुना ज्यादा कार्बन डाई आक्साईड थी वातावरण में...

ग्लोबल वार्मिंग के इस झूठे हव्वे की पोल खोलते कुछ और लेख देखिये:-

पोल खोल-१
पोल खोल-२
पोल खोल-३
पोल खोल-४
पोल खोल-५
पोल खोल-६


अब सवाल यह आता है कि कोपेनहेगेन वार्ता जो ७/१२/२००९ से शुरू हो गई है क्या उस से पहले हमारे मीडिया का फर्ज नहीं बनता था अपने पाठकों को यह सब बताने का... ताकि सरकार के फैसले में नागरिक भी दखल दे सकें... या ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेन्ज के शोर ने मीडिया का भी ऐसा ब्रेनवाश कर दिया कि उसने दूसरे पक्ष की सुनना तो छोड़िये क्लाइमेटगेट जैसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम को भी नजरअंदाज कर दिया...


क्षमा भी चाहूंगा आप सबसे, वक्त कम था, सामग्री ज्यादा थी और टैक्निकल थी, अत: लिंक थमा दिये, आप पूरे इतमीनान से पढ़िये फिर बताइये कि मेरी यह पोस्ट कैसी है और आप मुझसे सहमत हैं कि नहीं...

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रविवार, 6 दिसंबर 2009

आज छह दिसंबर है, प्रार्थना फल देती है तो ठीक,... वरना आईये मिलकर छलांग लगाते हैं . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .प्रवीण शाह.

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मेरे न्यायप्रिय मित्रों,

आज छह दिसंबर है, अलग अलग लोगों के लिये अलग अलग मायने हैं इसके... मेरे लिये यह दिन हमारे पूरे तंत्र की विफलता का दिन है... क्योंकि अयोध्या में जो विवाद है वह हमारी अदालतों में एक 'सिविल डिस्प्यूट' के तौर पर दर्ज है जिसमें अदालत ने केवल यह निर्णय देना है कि विवादास्पद प्रॉपर्टी पर TITLE यानी हक किसका है।

यह हमारा देश है, हमने खुद अपना संविधान बनाया है, हमारे चुने हुऐ प्रतिनिधियों ने संसद में बैठकर संविधान के अनुसार कानून बनाये हैं, हमारी न्यायपालिका स्वतंत्र है, आज तक न्याय पालिका ने हमें निराश नहीं किया कभी...

आज फिर छह दिसंबर है, आइये मिलकर प्रार्थना करें कि हमको, हमारे तंत्र को इतना साहस और इच्छा-शक्ति मिले कि न्यायपालिका से इस मामले को जल्द से जल्द निस्तारित करवा कर फैसले को अमल करा सकें... आखिर कब तक ऐसे ही SUSPENDED ANIMATION में रहेगा यह देश ?.... और क्यों रहे... क्या हम अपने ही देश में अपने ही कानून का पालन करने-करवाने में असमर्थ हैं ?...

अगर सचमुच ऐसा है तो आईये सभी लोग चुल्लू भर पानी में सामूहिक छलांग लगाते हैं...

तैयार हैं आप ?

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शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

गाँव गया था, गाँव से भागा....... यहां तो कुऐं में ही भांग मिल गई है ..... ..... .... .प्रवीण शाह

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मेरे 'शहरी' मित्रों,


कुछ काम ही ऐसा है मेरा, कि... हर माह ४-५ दिन जाना पड़ता है 'इंटीरियर' के गाँवों में... तो वहां के एक गाँव में एक दिन में जो देखा-सुना... बता रहा हूँ बिना अपनी तरफ से कुछ जोड़े या घटाये...


*** नरेगा ने दिहाड़ी बढ़ा दी है... अब १२०-१३० से कम में 'लेबर' नहीं मिलती... दिहाड़ी करने में 'लेबर' की कोई रूचि नहीं रही अब... अब तो ठेके का जमाना है, यानि ५-६ 'लेबर' ने किसान से ठेका कर लिया "अच्छा २५ बीघे का गन्ना काटना, छीलना और गाड़ी में लोड करना है... तो इतना 'नावा' देना होगा"... ठेका पटा तो फिर वही काम जो दिहाड़ी से १५ दिन में होता... ५ दिन में ही पूरा... जय हो 'मजदूर-किसान' की...


*** इस गाँव में सरकारी स्कूल है... एक मास्टर और दो शिक्षामित्र भी... मास्टर नवजवान और जोशीला... शिक्षामित्र इसी गाँव के... १६६ बच्चों के नाम लिखे हैं स्कूल में... मै्ने देखा मात्र १३ बच्चे पढ़ रहे हैं... शिक्षामित्र कहता है कि जब मिड-डे मील बंटेगा तो तकरीबन ४०-४५ बच्चे आ जायेंगे... साल की शुरूआत में जब वजीफा बंटता है हर बच्चे को ३६० रू० साल की दर से... तो माँ-बाप हर वक्त घेरे रहते हैं...लेकिन वजीफा मिलते ही कभी झांकने भी नहीं आते... वर्दी, बस्ता और किताबें सब मिलती हैं बच्चों को... पर स्कूल भेजने के नाम पर कहते हैं " क्या स्कूल जाकर हमारा लल्ला 'साहब' बन जायेगा"... ऐसा नहीं कि ये बच्चे कुछ काम ही कर रहे हों... स्कूल के ठीक सामने ही कंचे खेल रहे हैं, साईकिल का पहिया चला रहे है या फिर नदी के कीचड़ को उलीच कर 'भूरी' और 'मैलुआ' नाम की छोटी-छोटी मछलियों को पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं... जय हो 'सर्व शिक्षा अभियान' की...


*** अरे यहाँ तो अस्पताल भी है ... उत्साही डॉक्टर से मिलने जाता हूँ... एक रूपये का पर्चा बनता है... डॉक्टर कहता है कि जो १५०-२०० लोग दवाई लेने आते हैं उनमें ज्यादातर 'मरीज' नहीं हैं...ज्यादातर को 'ताकत' की तलाश है... एक मेरे सामने डॉक्टर को दिखाता है... परेशानी क्या है-'कमजोरी'... भूख, टट्टी, पेशाब सब ठीक... कोई खाँसी, बुखार नहीं... एक ताकत की बोतल चढ़ा देते डॉक्टर साहब... रात भर गन्ना छिला है इसने... मेहनत ज्यादा करने के कारण बदन दर्द कर रहा है... तुम्हें थोड़ी नींद की जरूरत है, डॉक्टर समझाता है... वो आँखें तरेरता है... बड़ी मुश्किल से डॉक्टर कोई पेन किलर आदि देकर पीछा छुड़ाता है उस से... डॉक्टर बताता है कि इन लोगों के लिये अच्छे ईलाज का माने है बोतल(आई० वी०) चढ़ना... इसके बाद नस में इंजेक्शन, मांस में इंजेक्शन, पीने वाला सिरप, कैप्सूल और फिर गोली का नंबर आता है... हर रोज कोई ४०-४५ साल का आदमी 'वृद्धावस्था पेंशन' वाले फॉर्म में अपनी उम्र ६५ साल लिखवाने के लिये परेशान करता है... जय हो 'सबके लिये स्वास्थ्य' की...


*** सोचा प्रधान से मिल लूँ... महिला प्रधान है...कहती हैं, नरेगा हमारे लिये आफत बन गई है... १०० दिन की १०० रू० दिन के हिसाब से मजदूरी तो सभी चाहते हैं... पर कोई काम करना किसी को मंजूर नहीं... सरकारी पैसा सरकार हमारे लिये भेजी है... काम करें न करें तुम्हारी जेब से तो नहीं जा रहा पैसा... कुछ टोका-टाकी करने पर अगले चुनाव में देख लेने की धमकी अलग से... किसी तरह से हमें विकलांग बना कर पेंशन बंधवा दो 'प्रधानी', ऐसा अनुरोध लेकर हट्टे-कट्टे अक्सर बैठे रहते हैं 'प्रधानी' की बैठक में... जय हो 'पंचायती राज' की...


*** फरवरी में शायद पंचायत के ईलेक्शन हैं... १०० रू० 'वोट' पर खुला रेट इस समय २५० रू० प्रति 'वोट' तक पहुंच गया है... आगे और बढ़ने की उम्मीद है... कुछ तो आधी रकम एडवांस अभी से पकड़ बैठे हैं... दारू-मुर्गे की दावतें पूरे जोर-शोर से चल रहीं हैं अभी से... जय हो 'डेमोक्रेसी'... जय 'भारत देश महान' की...


ऐसा नहीं लगता आपको, कि कुंऐ में ही भांग मिल चुकी है ?

अपनी राय बताइये अवश्य....

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

"भाग्य का खेल" है इसीलिये नैट पर बैठ कर सिर खपा रहा हूँ... वरना किसी अम्बानी, टाटा-बिरला या ओबामा के घर जन्म लेकर ठाठ से जी रहा होता............

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मेरे सहयात्री मित्रों,

सबसे पहले यह पोस्ट देखें।

इस पर मैंने जो टिप्पणी की थी वह इस प्रकार थी:-

आदरणीय पंडित वत्स जी,
"मेरा सिर्फ एक ही उदेश्य रहा है...वो ये कि इसके माध्यम से ज्योतिष एवं संबंधित पराविद्याओं के वास्तविक स्वरूप को आमजन तक पहुँचाना तथा तथाकथित पढे लिखे बुद्धिजीवी वर्ग की इन विषयों के प्रति अविश्वास एवं उपेक्षापूर्ण दृ्ष्टिकोण में बदलाव लाना ।"

यहाँ पर "तथाकथित पढ़े लिखे" लिखने के अर्थ व प्रयोजन पर प्रकाश डालेंगे तो आभारी रहूँगा।

आलेख में आप लिखते हैं:-
"जब कि आपकी जन्मकुंडली जो कि आपके जन्मकालीन ग्रहों पर आधारित होती हैं, वास्तव में वो ही आपके समस्त जीवन का सार है । आप अपने पूर्वार्जित कर्मों के अनुसार जन्म के साथ ही जो कुछ भी हानि-लाभ,सुख-दुख, कर्म-अकर्म, भाग्य-दुर्भाग्य इत्यादि के रूप में अपने साथ संग्रहित कर के लाते हो---उसे जानने का एकमात्र माध्यम सिर्फ आपकी जन्मकुंडली ही है । उसी के आधार पर आपको अपने भावी जीवन में फल की प्राति होती है ।"
"लेकिन यदि कोई वस्तु आपके भाग्य में लिखी ही नहीं गई है तो उसमें उपाय क्या कर सकता है? आप चाहे दिन रात उपाय करते रहें-----जब भाग्य में है ही नहीं तो उसमे उपाय क्या करेगा ।"

अपनी टिप्पणी में आपने लिखा है:-
"अगर जन्मपत्रिका से ये भी नहीं पता चल पाता कि इन्सान के भाग्य में क्या लिखा है...तो फिर तो ज्योतिष विद्या का कोई औचित्य ही नहीं था ।
ज्योतिष विद्या का मूल उदेश्य यही है कि इसके माध्यम से इन्सान ये जान पाता है कि वो अपने पूर्वार्जित कर्मों के फलस्वरूप अपने साथ भाग्य रूप में क्या लेकर आया है..ओर कितना लेकर आया है ।
किन्तु हमारे जो वर्तमान में किए जा रहे कर्म हैं, वो हमारे "पुरूषार्थ" के अधीन होते हैं...जिनमे सुधार करके अथवा बाह्य रूप में उपाय इत्यादि द्वारा अपने जीवन में परिवर्तन किया जा सकता है...लेकिन भाग्य का फल अटल है...उसके फलों में किसी भी प्रकार से कोई कमी/वृ्द्धि नहीं की जा सकती । "


उपरोक्त को पढ़ कर जो सवाल मन में उठा है वो इस प्रकार है।

आपके आलेख के अनुसार जन्म पत्रिका से यह पता चल जाता है कि इन्सान के भाग्य में क्या है। जन्म पत्रिका जन्म के सही समय व स्थान के आधार पर बनाई जाती है,माता पिता के नाम,काम,रंग,कुल,गोत्र से इसका संबंध नहीं है। जिस प्रकार सैकड़ों साल पहले की ग्रहस्थिति की गणना संभव है उसी प्रकार वर्ष २०१० के दौरान किसी स्थान, उदाहरण के लिये दिल्ली के आसमान की ग्रह स्थिति के बारे में भी जाना जा सकता है। यदि ज्योतिषी एकमत होकर गणऩा करते हैं कि जून २०१० को दिल्ली में एक लग्न विशेष में पैदा होने वाले जातक किसी क्षेत्र विशेष में शिखर तक जायेंगे... और क्योंकि चिकित्सा विज्ञान की तरक्की के कारण ३४ सप्ताह से अधिक समय से गर्भवती माता का प्रसव कभी भी कराना संभव है... तो यदि माता पिता चाहें तो उसी लग्न में बच्चे का जन्म करा कर उसके अच्छे भाग्य को सुनिश्चित कर सकते हैं कि नहीं?... दूसरा यदि अनेकों बच्चों का जन्म उसी लग्न में कराया जाये तो कंया सभी समान आयु वाले और समान भाग्य वाले होंगे?... तीसरा क्या ज्योतिष की मदद से गर्भावस्था के ९वें माह के दौरान वह पूरे देश का वह स्थान व समय चुना जा सकता है जहाँ पर जन्म लेने पर जातक शारीरिक रूप से सुन्दर, बलशाली, दीर्घायु, बुद्धिमान, स्वस्थ, सफल और माता पिता के लिये शुभ फलकारी होगा... यदि ऐसा संभव है तो यूरेका !!! सारी समस्याओं का हल तो ज्योतिष के पास ही है और इन्सान फालतू में परेशान है।




अब देखिये जो जवाब मुझे प्राप्त हुआ है वह क्या है:-

"@ प्रवीण शाह जी,
किसी भी विषय में तर्क-वितर्क करना हो तो सबसे पहले हमें उस विषय की जानकारी होनी आवश्यक है...ओर दूसरे यदि हम अपनी धारणाओं को दरकिनार कर खोजने का प्रयास करें तो ही सत्य का अनुशीलन कर सकते हैं । अन्यथा हमें सिर्फ वो ही दिखाई देगा...जिसे कि हम देखना चाहते हैं ।
इसलिए यदि आप वास्तव में इस विद्या को सत्य/असत्य की कसौटी पर परखना चाहते हैं तो सबसे पहले तो आप विधिवत इसका पूर्णरूपेण ज्ञान हासिल करें....सीखने,समझने का प्रयास करें..ओर नहीं तो कम से कम मूलभूत जानकारी तो अवश्य ही जुटा लें...ताकि आप अपने विचार ठीक से रख सकें ओर मेरी बात को आप अच्छे से समझ सकें...।


ओर एक बात कि ज्योतिष में आप के आधुनिक विज्ञान की भान्ती कल्पना का कोई स्थान नहीं है...."यदि ऎसा हो तो? यदि वैसा हो तो ?" इस प्रकार के वाक्य सिर्फ विज्ञान में ही प्रयोग किए जाते हैं..ज्योतिष जैसे किसी शाश्वत ज्ञान में नहीं । यदि सबकुछ आप के हाथ में होता तो आपको यहाँ नैट पर बैठकर सिर खपाई न करनी पडती...किसी अम्बानी,टाटा-बिरला या ओबामा के घर में जन्म लेकर ठाठ से जी रहे होते....दुनियावाले इसी को "भाग्य का खेल" कहते है....
काश आप समझ पाते ओर मैं आपको समझा पाता....खैर..."






मतलब साफ है कि ज्योतिष जैसे शाश्वत ज्ञान के आदरणीय पंडित वत्स जी जैसे साधक यदि कुछ ज्ञान की बात बताते हैं तो उस पर कोई सवाल अगर आप कर रहे हैं तो इसलिये कि आप "भाग्य का खेल" के मारे हुऐ हैं... और केवल इसीलिये नेट पर बैठ कर सिर खपा रहे हैं... अन्यथा किसी अम्बानी,टाटा-बिरला या ओबामा के घर में जन्म लेकर ठाठ से जी रहे होते।


सच कहूँ तो यह जवाब कुछ हजम नहीं हुआ मुझको...


आप क्या सोचते हैं इस बारे में ? बताइये जरूर...

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शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

जी हाँ, मैं ही हूँ "शाश्वत सत्य"... और आप चाहो या न चाहो.. थोड़ी देर बाद आपका ही एक हिस्सा बनने जा रहा हूँ !!! ...

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जिज्ञासु मित्रों,
आज कथा सुना रहा हूँ आपको "शाश्वत सत्य" की...उसी के शब्दों में...

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मैं कब से ऐसा ही हूँ, मुझे खुद भी नहीं पता...शायद अनादिकाल से किसी दूसरे रूप में रहा ही नहीं मैं... जो आज मैं सुना रहा हूँ वो तो मेरी कहानी का एक छोटा सा हिस्सा मात्र है...

चलिये शुरू करते हैं...
एक सेब के अन्दर था मैं अफगानिस्तान की खूबसूरत वादियों में... पकने पर बागबान ने सेब तोड़ा, पैक किया और बाजार भेज दिया...बाजार में सबसे पहले बिकी वो रसीले सेबों की पेटी...और उतारी गई एक कैम्प में... जहां सुबह की नमाज के बाद लम्बी दाड़ी वाले एक शख्स ने मिशन पर जाने से पहले मेरे वाले सेब का नाश्ता किया और सेब के साथ साथ मैं भी पहुँच गया उसके पेट के भीतर...वक्त ने मेरा अगला पढ़ाव तय करना था कि अचानक... दुनिया ने एक जोर का धमाका सुना... एक बार फिर अफगान सेना पर 'फिदायीन सुसाइड बॉम्बर' ने हमला किया था...५ सैनिक और १० बेकसूर नागरिक, जिनमें ४ बच्चे थे, 'जेहाद' की भूख का पेट भरने के काम आ गये... धमाके की गर्मी इतनी थी कि मैं भी भाप बन कर उड़ चला...

अगला ठिकाना था बादलों की गोद में...मौसम बदले...कुदरत ने खेल खेले... तेज हवायें चली... बादल उड़े... अचानक लो प्रेशर जोन बना... बरसात हुई और मैं भी पहुँच गया 'जम-जम' के चारों ओर की पहाड़ियों पर... मिट्टी, रेत और चट्टानों के बीच सफर करते हुऐ न जाने कब और कैसे मैने अपने को पाया 'जम-जम' के भीतर...

आमिर आया था अपनी दादी के साथ हज करने... 'जम-जम' का पवित्र जल भर अपने वतन ले आया वो... वतन था हिन्दुस्तान... मैं भी था उस बर्तन के भीतर...

बहुत सारे लोग आये हाजी आमिर और उसकी दादी के स्वागत को... एक बड़े से बाग में इकठ्ठा थे लोग... सब गले मिले आमिर से... फिर आमिर ने 'जम-जम' का पवित्र जल बांटना शुरु किया... एक बूंद छिटकी... और मोती सी दमकती उस बूंद के भीतर मैं भी पड़ा रहा रात भर दूब घास पर... दूसरे दिन सूरज की तपिश बर्दाश्त नहीं हुई... और फिर मैं उड़ चला...

इस बार बादल उड़े उत्तर की ओर...और बर्फ बन कर आये जमीन पर...उसी बर्फ के बीच पड़ा रहा मैं गर्मी आने तक...गर्मी में गोमुख ग्लेशियर की बर्फ पिघली...और मैं भी आजाद हुआ...बहता रहा गंगा में...'हर की पैड़ी' पर अमर ने गंगाजली भरी... और मैं गंगाजली के भीतर...

बड़े ही दुख का माहौल था जब अमर घर पहुंचा... "अरे कोई सोने का टुकड़ा और गंगाजल डालो दादाजी के मुँह में"...मुझे तो कुछ समझ नहीं आया मेरे मुंह में जाते ही क्यों और कैसे दादाजी के प्राण-पखेरू उड़ गये तुरंत इहलोक को...

फिर चंदन की चिता सजी...मुखाग्नि दी गई...और पंचतत्व का शरीर पंचतत्व में मिल गया...और मैं एक बार फिर से बादलों के बीच...

एक बार फिर बरसे बादल...बारिश की बूंदों के बीच मैं पहुंचा एक बड़े से तालाब में... वक्त ने फिर करवट ली और मैं बन गया हिस्सा एक मछली के शरीर का...

पीटर रोज नियम से आता था मछली पकड़ने...और एक दिन मेरी वाली पूरे डेढ़ किलो की मछली फंस ही गई उसके कांटे में... शाम को पीटर के घर दावत हुई...और उसी मछली के एक टुकड़े के जरिये मैं पीटर का हिस्सा बन गया... और बना रहा उसकी आखिरी सांस तक...

बुढ़ापे से लड़ते लड़ते एक दिन पीटर ने भी हार मान ली...पूरा मोहल्ला आया उसकी अंतयेष्टि में...मैं भी दफन हो गया छह फुट नीचे पीटर के 'मोर्टल रिमेन्स' के साथ...

दिन साल में बदले...और कुछ साल बाद ही मैं हिस्सा बन गया मिट्टी का...जहां से एक पेड़ की जड़ ने मुझे अंदर खींचा और पहुंचा दिया अपने फूल तक... उन सफेद सुगंधित फूलों का गजरा बना... बाजार में बिका...एक चुलबुली शरारती लड़की ने दिन भर बालों को सजाया उससे और रात को फेंक दिया पार्क के एक कोने में...

मेरा फूल भी मुरझाया... फिर धूप की मार लगी...उष्मा मुझसे सहन नहीं हुई और मैं एक बार फिर आसमान में बादलों की गोद में...

इस बार बादल बरसे हैं आपके शहर के करीब... खेत खेत, गांव गांव, नाली नाली बहता हुआ पहुंचा मैं उस नदी में... जहां से पानी पम्प किया जाता है वाटर ट्रीटमेंट प्लान्ट के लिये... ट्रीटमेंट फिर क्लोरीनेशन और सप्लाई...

अरे हाँ चौंकिये नहीं... इसी तरह मैं यानी "शाश्वत सत्य" आज आपके सामने हूँ... आपके चाय, कॉफी, सूप, जूस, शरबत या पानी के गिलास में...

इस पोस्ट को पढ़ने के बाद जब आप अगला 'सिप' लेंगे... तो मैं आपका भी हिस्सा बन ही जाउंगा... आप चाहो या न चाहो...



विशेष टिप्पणी:-
जल यानी पानी यानी WATER के एक अणु (MOLECULE) की सच्ची कहानी है यह, वर्णन को सरल बनाये रखने के लिये मैंने यानी ब्लॉगलेखक ने इस अणु (MOLECULE) का नाम रखा है "शाश्वत सत्य"...
अब देर किस बात की है घूंट भरिये और शाश्वत सत्य को अंगीकार करिये।
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बुधवार, 18 नवंबर 2009

तस्मै श्री गुरूवै नम:......Will these preachers show some courage ?...( एक दोबारा ठेली गई पोस्ट.)........................ प्रवीण शाह

आज फुरसत में बैठा ब्लॉगवाणी देख रहा था तो अचानक मेरी नजर ब्लॉगवाणी द्वारा रखे गये मेरे ब्लॉग के लेखे जोखे पर पड़ी तो पाया कि मेरी इस पोस्ट को ब्लॉगवाणी से मात्र एक ही पाठक मिल पाया, जबकि पसन्द एक और टिप्पणी कोई नहीं मिली...
आज दोबारा से ठेल रहा हूँ इस पोस्ट को बेहतर परिणामों की उम्मीद के साथ...

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सुधी मित्रों,

सबसे पहले तो मेरा डिस्क्लेमर :-

"एक हिन्दू या यों कहें सनातन धर्मी परिवार में जन्म हुआ है मेरा, पिता जनेऊ पहनते हैं और नियम से संध्या, पूजा, पाठ करते हैं। माँ की ईश्वर में अटूट आस्था है पर बंधी नहीं वो किसी कर्मकान्ड से, जब मन चाहा खाना बनाते, सब्जी काटते, कपड़े धोते या नहाते हुऐ संस्कृत के श्लोक, आरतियां, हनुमान चालीसा, भजन आदि गाती रहती है। मन हुआ तो मंदिर गईं, नहीं तो नहीं...गुरुद्वारे जाती है तो पूर्ण श्रद्धा से शीश नवाती है, चर्च में भी ईश्वर मौजूद मिलता है उसे, दिल्ली गई तो जामा मस्जिद की सीढियों पर भी ठिक उसी तरह माथा टेका उसने, जैसा मंदिर में टेकती है।
रहा सवाल मेरा तो किसी भी तरह के नियम या परिभाषा में नहीं बंधना चाहता मैं, मेरे लिये धर्म का अर्थ यही है कि ऐक भारतीय होने के नाते अपने अधिकार मांगने से पहले अपने कर्तव्य को सही तरह से निभा सकूं, और हाँ न तो किसी गुरु की जरूरत हुई है मुझे आज तक और न ही किसी को गुरु बनाया है मैंने..."


अब आते हैं मुद्दे पर...

टीवी खोलो तो कम से कम १० चैनल मिलेंगे जो पूरी तरह से धार्मिक और आध्यात्मिक प्रोग्राम ही दिखाते हैं और इन्हीं चैनलों में शाश्वत वास है गुरूओं, बाबाओं, बापुओं, भाइयों, महाराजों, योगियों, पूज्यों, साध्वियों, बहनों, दीदियों, अम्माओं आदि आदि का जो दिन रात लगे हैं ज्ञान वर्षा करने में...

इनमें से अधिकतर की धर्म और आध्यात्म के क्षेत्र में कोई उपलब्धि नहीं रही है ज्यादातर कीर्तन, भजन ,जागरण और कथावाचन करते करते तरक्की कर गुरु बन गये हैं पर हमें इस से क्या...ज्ञान तो कोई भी बांट सकता है।

शायद एकाध साल पहले एक चैनल ने इनमें से कुछ की पोल भी खोली थी कि किस तरह वो १० रूपये लेकर १०० की रसीद देते हैं और टैक्स चोरों की मदद करते हैं...पर हमें इस से कुछ लेना देना नहीं...

एक और बात जो वाक चातुर्य के धनी यह गुरु अपने शिष्यों के दिमाग में ठूंसते हैं कि जीवन का एकमात्र उद्देश्य है परमात्मा से साक्षात्कार और मोक्ष ( जो एक अपरिभाषित शब्द है आजतक)...और यह सब केवल और केवल गुरु ही दिला सकता है...गुरु तो सामने बैठा ही है!...खैर इस से भी अपन को क्या...

चंद किस्से कहानियों, चुटकुलों, पौराणिक प्रसंगों, कीर्तनों, भजनों ,गानों और बैकग्राउंड म्यूजिक के दम पर ऊँचे सिंहासनों पर बैठे ये गुरु नृत्य और संगीत सहित सत्संग का एक ऐसा शो रचते हैं कि सामान्य बुद्धि का कोई भी आदमी चकरा जाये और इन्हीं में ईश्वर का प्रतिरूप देखने लगे...यही कारण है कि कुछ घरों में इनके फोटो आपको देवताओं के साथ लगे मिलेंगे...लेकिन मुझे कोई ऐतराज नहीं इस पर भी...

इन में से कुछ स्वयं और कुछ शिष्यों के नेटवर्क द्वारा धार्मिक और पर्यटन की दॄष्टि से महत्व पूर्ण स्थानों पर आश्रम बनाने के नाम पर बेशकीमती सरकारी जमीन और जंगल घेर रहे हैं...फ्लैट बना कर बेच रहे हैं...भू माफिया का जैसा काम कर रहे हैं...पर यह देखना तो शासन प्रशासन का काम है...हम क्यों चिंता करें फालतू में...

इनमें से कई ऐसे हैं जिनका कार्य है वरिष्ठ पदों पर आसीन नेताओं, अधिकारियों और बड़े व्यवसाइयों के बीच नेटवर्किंग कर डील करवाना...हमारे धर्म निरपेक्ष मुल्क में भक्ति पर तो कोई रोक है नहीं...अत: इनके आलीशान पांच सितारा आश्रमों में इन तीनों श्रेणियों के महानुभाव आसानी से मिलकर मोलभाव कर सौदा कर सकते है...विभिन्न नियामक तो हैं इस गड़बड़झाले पर नजर रखने के लिये...सो डोन्ट वरी...


इन गुरुओं को अपने भक्तों के आध्यात्मिक और धार्मिक उत्थान का भी बड़ा ख्याल रहता है अत: ये गुरु दक्षिणा के नाम पर अपने भक्तों से कभी कभी कुछ संकल्प भी करवाते हैं जैसे...
१- मैं जीवन भर मांसाहार का सेवन नहीं करूंगा।
२- शराब और सिगरेट-तम्बाकू छोड़ दूंगा।
३- तामसिक भोजन, लहसुन-प्याज आदि का त्याग कर दूंगा।
४- सप्ताह में एक बार कम से कम सत्संग में जाउंगा।
५- रोज सुबह गौमाता को चार रोटी खिलाउंगा।
आदि आदि...
कोई हानि नहीं इन संकल्पों से भी...



अब कल्पना कीजिये उस स्थिति की...यही गुरु लोग गंगाजल भक्तों के हाथ में देकर उन्हें निम्न संकल्प दिलवा रहे हैं...
१- मैं अपने लड़के की शादी में न तो दहेज लूंगा और न बिटिया के विवाह में दूंगा।
२- मैं अपने व्यवसायिक और निजी जीवन में किसी भी तरह की टैक्स चोरी नहीं करूंगा, सरकार को प्रत्येक टैक्स पूरा दूँगा, अपनी इस्तेमाल की गई बिजली और पानी का पूरा दाम चुकाउंगा।
३- मैं किसी तरह की बख्शीश, घूस, रिश्वत या सुविधा शुल्क न तो दूंगा और न ही लूंगा।
४- मैं किसी भी काम के लिये न तो सिफारिश करवाउंगा और न किसी की गलत सिफारिश को मानूंगा।
५- जाति व्यवस्था यानि समाज के कोढ़ को खत्म करने का प्रयास करुंगा और जीवन का कोई भी निर्णय जाति के आधार पर नहीं लूंगा।
६- मैं अपने उद्योग या प्रतिष्ठान में काम करने वाले कर्मचारियों व श्रमिकों का शोषण नहीं करूंगा, उन्हें इतना वेतन दूंगा कि वोसम्मान से सर उठाकर एक उपयोगी जीवन जी सकें तथा मुनाफे में भी कुछ हिस्सा उन को दूंगा।


अगर ये गुरु ऐसा करने लगें तो क्या होगा...???

इन गुरुओं के पंडाल खाली हो जायेंगे...तंबू उखड़ जायेंगे...और इनके भक्तों का नाम विलुप्त प्राय: जीवों की लिस्ट में आ जायेगा...

काफी कड़वा तो है......मगर यह सच है...

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शनिवार, 14 नवंबर 2009

श्री श्री श्री जूता-मारेश्वर जी महाराज, ईश्वर, धर्म, ज्योतिष, भाग्यवाद और कड़वी हकीकत...... प्रवीण शाह

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मित्रों,

एक स्थिति की मेरे साथ-साथ कल्पना कीजिये:-

संघ लोक सेवा आयोग के परिसर में बहुत हलचल है, देश की एक प्रतिष्ठित सेवा के लिये साक्षात्कार होने हैं, २५ कक्षों मे २५ ही इन्टरव्यू बोर्ड बैठे हैं जो अगले ३ दिनों में १००० आवेदकों, जो कि लिखित परीक्षा में सफल होकर साक्षात्कार के योग्य पाये गये हैं, के साक्षात्कार लेंगे।

साक्षात्कार बस शुरू ही होने वाले हैं कि अचानक आगमन होता है श्री श्री श्री जूता-मारेश्वर जी महाराज का, अपने चेलों के साथ। महाराज बहुत पहुंचे हुऐ सिद्ध पुरुष बताये जाते हैं और यहाँ पर परीक्षार्थियों का उद्धार करने आये हैं, उनके आशीर्वाद का तरीका सीधा-सादा है, साक्षात्कार कक्ष में जाने से पहले प्रत्येक परीक्षार्थी अपने पैर से जूता निकाल कर महाराज की पीठ पर मारे-उसके बाद आशीर्वाद स्वरूप महाराज भी उसकी पीठ पर उसी जूते से प्रहार करेंगे, लगभग सभी परीक्षार्थियों ने आशीर्वाद लिया...

तीन दिन बाद चले साक्षात्कार के बाद चौथे दिन परिणामों की घोषणा हुई...और...

१५० परीक्षार्थी सफल घोषित किये, लगभग सभी महाराज के जीवन भर के लिये भक्त हो गये और महाराज के चित्र अपने घर में लगाने के लिये ले गये।

२५ परीक्षार्थी प्रतीक्षा सूची में आये, वे अपने ही भाग्य को दोष देते हुए शीघ्र मुख्य सूची में आने की आस लिये हुऐ फिर महाराज का आशीर्वाद ले अपने घरों को गये।

जो परीक्षार्थी असफल हुऐ, उनके मन में जो-जो आया वो कुछ इस प्रकार था:-
- महाराज को जूता मारने में मुझ से ही कुछ कमी रह गई, मैं थोड़ा और जोर से मारता तो अच्छा होता...
- कहीं ज्यादा जोर से तो नहीं मार दिया मैंने? महाराज को चोट तो नहीं लग गई...
- मेरा जूता कैनवास/रबड़/सिंथेटिक मटीरियल का था, शायद चमड़े का जूता ही सही होता...
- अपशकुन तो तभी हो गया जब मेरी मति मारी गई और मैंने दाहिने के बजाय बाँये पैर का जूता उतारा...
- जूता मारते समय महाराज के प्रति मेरी आस्था थोड़ी डगमगाई थी...
- मैंने पूर्ण समर्पण के साथ अपना सब कुछ महाराज के हाथों में नहीं सौंपा...
- ज्योतिषी ने पहले ही बताया था कि मेरी राशि का समय खराब चल रहा है...महाराज क्या करते...

झूठ नहीं कहूँगा ५-१० ऐसे भी थे, जिन्होंने न महाराज का आशीर्वाद लिया और न ही अपनी सफलता या असफलता का जिम्मेदार किसी और को ठहराया।



अब कुछ देर के लिये आँखें बंद करिये और सोचिये...श्री श्री श्री जूता-मारेश्वर जी महाराज होते या न होते... आशीर्वाद देते या न देते...साक्षात्कार का परिणाम तो हर हाल में यही रहता...यानी...
१००० में से :-
१५० सफल होते
२५ प्रतीक्षा सूची में आते
और शेष असफल घोषित होते



जीवन के हर क्षेत्र में कमोबेश ऐसी ही स्थितियां होती हैं...श्री श्री श्री जूता-मारेश्वर जी महाराज तो मात्र एक बहाना है मेरे लिये...अपनी बात आपके सामने रखने का...औसत और संभाव्यता के गणितीय नियम हर क्षेत्र में लागू होते हैं...परन्तु ऊपर वर्णित परीक्षार्थियों सी मनस्थिति रखने वाला मानव समाज क्या इसी वजह से ईश्वर व धर्म जैसी परिकल्पनाओं का पोषण नहीं कर रहा है?...
धर्म, ईश्वर, ज्योतिष और भाग्यवाद जिंदा है तथा दिनबदिन और फलफूल रहे हैं क्योंकि उन्हें मानव की ऐसी मनस्थिति का सहारा और औसत व संभाव्यता के गणितीय नियमों का फायदा मिल रहा है...सत्य है कि नहीं?


सोचिये! फिर आप ने क्या नतीजा निकाला बताईये जरूर...


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रविवार, 8 नवंबर 2009

टाईम ट्रैवल और टाईम मशीन के बहाने ज्योतिष शास्त्र के विज्ञान होने या न होने का विश्लेषण...........

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मेरे सत्यसाधक मित्रों,

गणित की ही तरह तर्कशास्त्र में भी यदि हम दो परस्पर विपरीत कथनों की एक साथ तुलना करते हैं, तथा हम पूरे विश्वास के साथ कह सकते हैं कि इनमें से एक कथन सत्य है/ सत्य हो सकता है तो यह निष्कर्ष मान लिया जाता है कि विपरीत कथन गलत है।

विज्ञान फंतासी लेखकों का एक बड़ा ही लोकप्रिय विषय है टाईम ट्रेवल और टाईम मशीन, यह एक ऐसे उपकरण की कल्पना है जिसमें बैठ कर कोई भी मनुष्य भूतकाल या भविष्य के किसी भी समय में सशरीर अपनी पूरी मानसिक और शारीरिक क्षमताओं के साथ जा सकता है। अब एक पल के लिये मान लीजिये कि टाईम मशीन सचमुच बन सकती है और टाईम ट्रेवल संभव है, अब नीचे लिखी तीन स्थितियाँ देखिये:-
१- बहुत गुस्सेबाज और शक्तिशाली श्रीमान शेर सिंह अपने परदादा की सगाई में जाते हैं और वहीं किसी बात पर अपने परदादा से झगड़ा कर बैठते हैं झगड़ा इतना बढ़ जाता है कि श्रीमान शेर सिंह अपने परदादा की सगाई होने से पहले ही गला दबा कर हत्या कर देते हैं।
२- चरित्रवान, शान्त और आदर्शवादी श्रीमान सौम्य प्रताप विवाह करने से पहले ही अपने प्रपौत्र को देखने जाते हैं टाईम मशीन से, उन्हे प्रपौत्र मिलता तो है पर एक जेल के अंदर जहाँ वो देश के विरूद्ध जासुसी और एक सैन्य अधिकारी की हत्या की सजा काट रहा है। अपने वंश की यह गत देखकर श्रीमान सौम्य प्रताप इतने खिन्न हो जाते हैं कि आजीवन विवाह ही नहीं करते।
३- श्रीमती शान्त शान्ति टाईम मशीन से जाती हैं रामायण काल मे् माता सीता से मिलने, क्योंकि रामायण वो पढ़ चुकी हैं और उसमें हुआ रक्तपात उनको पसंद नहीं इसलिये वो सीता माता को रावण के षड़यंत्र के बारे में बता कर लक्ष्मण रेखा को कतई पार न करने के बारे में आगाह कर देती हैं, माता सीता उनकी सलाह मान लेती हैं और रावण सीता माता का अपहरण करने में नाकाम रहता है, नतीजा राम-रावण युद्ध की आवश्यकता ही नहीं होती।

अब जरा दिमाग पर जोर देकर सोचिये कि क्या उपरोक्त तीन में से कोई कथन सत्य हो सकता है ? जवाब होगा...नहीं!
इसीलिये यह माना जाता है कि कल्पना के घोड़े जितने भी दौड़ा लिये जायें पर हकीकत में टाईम ट्रेवल करना और टाईम मशीन बनना असंभव है।



अब मैं ऊपर बताये गये तरीके से ही ज्योतिष शास्त्र(जो भविष्य को बताने का दावा करता है) के बारे मे निष्कर्ष निकालने का प्रयत्न करूंगा।
स्थिति १ :-
सारे ज्योतिषी एक मत होकर भविष्यवाणी करते हैं कि श्रीमान समंदर लाल की मृत्यु समुद्र में डूबने से ही होगी।
प्रतिक्रिया:- समंदर लाल जी कसम खा लेते हैं कि वो आजीवन अपने १४ मंजिले फ्लैट से ही बाहर नहीं जायेंगे।
स्थिति २ :-
सारे ज्योतिषी एक मत होकर भविष्य वाणी करते हैं कि टीम बेईमानिस्तान अपना ५ दिन बाद होने वाला क्रिकेट मैच जीतेगी।
प्रतिक्रिया:- टीम बेईमानिस्तान मोटी रकम के बदले मैच फिक्स कर लेती है और मैच हार जाती है।
स्थिति ३ :-
सारे ज्योतिषी एक मत होकर भविष्यवाणी करते हैं कि शेयर मार्केट आज ऊपर जायेगा।
प्रतिक्रिया:- कुछ बेईमान और आपराधिक प्रवॄत्ति के मंदड़िये उस दिन शहर में कुछ धमाके करा देते हैं और शेयर बाजार धड़ाम से औंधे मुंह गिर जाता है।

अब हम यदि टाइम मशीन और टाईम ट्रेवल की संभाव्यता के बारे में नतीजे पर पहुंचने के तरीके को यहां पर प्रयोग करें तो आप देखेंगे कि तीनों स्थितियों मे प्रतिक्रिया पूरी तरह संभव है। जिसका सीधा निष्कर्ष है कि चाहे ज्योतिष हो या टैरो या क्रिस्टल बॉल गेजिंग... भविष्य का पूर्ण निश्चितता के साथ कथन असंभव है।


आप सहमत हैं मुझसे या नहीं ?
अपनी टिप्पणी में बताईयेगा जरूर !

रविवार, 1 नवंबर 2009

शर्मनाक !!! शर्मनाक !!! शर्मनाक !!!... क्या यही है धर्म और धर्मध्वजाधारियों का वैचारिक स्तर ?

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मेरे न्यायी मित्रों,

पिछले कुछ दिन से इलाहाबाद ब्लॉगर गोष्ठी और उस से उपजी पोस्टों और विवादों को किनारे पर खड़ा देखने में मस्त था बिना कोई राय व्यक्त किये... जुम्मा जुम्मा चार दिन पुराना ब्लॉगर जो हूँ...कहीं यह भी पढ़ा कि ब्लॉगजगत को सेल्फ सेंसरशिप की जरूरत भी पड़ेगी...शायद शीघ्र ही...किसी भी सेंसरशिप का विरोधी हूँ और रहूंगा...अपनी आखिरी सांस तक...

आज बड़े दुखी मन के साथ यह पोस्ट लिख रहा हूँ...
आगे बढ़ने से पहले कृपया इन दो पोस्टों और खास तौर पर उन पर आई गंदी, अपमानजनक और दुर्भावना पूर्ण टिप्पणियों को अवश्य देखें...

पोस्ट संख्या-१...

पोस्ट संख्या-२...

मेरा सवाल सीधा सादा है...
इन और ऐसी ही विवादास्पद पोस्टों को लिखने के पीछे इन ब्लॉगरों का मंतव्य क्या है? क्या इन पोस्टों पर आई गंदी, अपमानजनक और दुर्भावना पूर्ण टिप्पणियां ब्लॉगिंग के भविष्य के प्रति चिंतित नहीं करतीं आप को ?
कोई उपाय है इस सब को रोक पाने का...

ऐसे तथाकथित धार्मिकों से तो नास्तिक लाख गुने बेहतर हैं...

रविवार, 11 अक्तूबर 2009

जिस दिन ऐसा कोई संकल्प दिलाने लगेंगे.....तो तंबू उखड़ जायेंगे...इन गुरुओं और बाबाओं के !..Will these preachers show some courage against social evils?

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सुधी मित्रों,

सबसे पहले तो मेरा डिस्क्लेमर :-
"एक हिन्दू या यों कहें सनातन धर्मी परिवार में जन्म हुआ है मेरा, पिता जनेऊ पहनते हैं और नियम से संध्या, पूजा, पाठ करते हैं। माँ की ईश्वर में अटूट आस्था है पर बंधी नहीं वो किसी कर्मकान्ड से, जब मन चाहा खाना बनाते, सब्जी काटते, कपड़े धोते या नहाते हुऐ संस्कृत के श्लोक, आरतियां, हनुमान चालीसा, भजन आदि गाती रहती है। मन हुआ तो मंदिर गईं, नहीं तो नहीं...गुरुद्वारे जाती है तो पूर्ण श्रद्धा से शीश नवाती है, चर्च में भी ईश्वर मौजूद मिलता है उसे, दिल्ली गई तो जामा मस्जिद की सीढियों पर भी ठिक उसी तरह माथा टेका उसने, जैसा मंदिर में टेकती है।
रहा सवाल मेरा तो किसी भी तरह के नियम या परिभाषा में नहीं बंधना चाहता मैं, मेरे लिये धर्म का अर्थ यही है कि ऐक भारतीय होने के नाते अपने अधिकार मांगने से पहले अपने कर्तव्य को सही तरह से निभा सकूं, और हाँ न तो किसी गुरु की जरूरत हुई है मुझे आज तक और न ही किसी को गुरु बनाया है मैंने..."


अब आते हैं मुद्दे पर...

टीवी खोलो तो कम से कम १० चैनल मिलेंगे जो पूरी तरह से धार्मिक और आध्यात्मिक प्रोग्राम ही दिखाते हैं और इन्हीं चैनलों में शाश्वत वास है गुरूओं, बाबाओं, बापुओं, भाइयों, महाराजों, योगियों, पूज्यों, साध्वियों, बहनों, दीदियों, अम्माओं आदि आदि का जो दिन रात लगे हैं ज्ञान वर्षा करने में...

इनमें से अधिकतर की धर्म और आध्यात्म के क्षेत्र में कोई उपलब्धि नहीं रही है ज्यादातर कीर्तन, भजन ,जागरण और कथावाचन करते करते तरक्की कर गुरु बन गये हैं पर हमें इस से क्या...ज्ञान तो कोई भी बांट सकता है।

शायद एकाध साल पहले एक चैनल ने इनमें से कुछ की पोल भी खोली थी कि किस तरह वो १० रूपये लेकर १०० की रसीद देते हैं और टैक्स चोरों की मदद करते हैं...पर हमें इस से कुछ लेना देना नहीं...

एक और बात जो वाक चातुर्य के धनी यह गुरु अपने शिष्यों के दिमाग में ठूंसते हैं कि जीवन का एकमात्र उद्देश्य है परमात्मा से साक्षात्कार और मोक्ष ( जो एक अपरिभाषित शब्द है आजतक)...और यह सब केवल और केवल गुरु ही दिला सकता है...गुरु तो सामने बैठा ही है!...खैर इस से भी अपन को क्या...

चंद किस्से कहानियों, चुटकुलों, पौराणिक प्रसंगों, कीर्तनों, भजनों ,गानों और बैकग्राउंड म्यूजिक के दम पर ऊँचे सिंहासनों पर बैठे ये गुरु नृत्य और संगीत सहित सत्संग का एक ऐसा शो रचते हैं कि सामान्य बुद्धि का कोई भी आदमी चकरा जाये और इन्हीं में ईश्वर का प्रतिरूप देखने लगे...यही कारण है कि कुछ घरों में इनके फोटो आपको देवताओं के साथ लगे मिलेंगे...लेकिन मुझे कोई ऐतराज नहीं इस पर भी...

इन में से कुछ स्वयं और कुछ शिष्यों के नेटवर्क द्वारा धार्मिक और पर्यटन की दॄष्टि से महत्व पूर्ण स्थानों पर आश्रम बनाने के नाम पर बेशकीमती सरकारी जमीन और जंगल घेर रहे हैं...फ्लैट बना कर बेच रहे हैं...भू माफिया का जैसा काम कर रहे हैं...पर यह देखना तो शासन प्रशासन का काम है...हम क्यों चिंता करें फालतू में...

इनमें से कई ऐसे हैं जिनका कार्य है वरिष्ठ पदों पर आसीन नेताओं, अधिकारियों और बड़े व्यवसाइयों के बीच नेटवर्किंग कर डील करवाना...हमारे धर्म निरपेक्ष मुल्क में भक्ति पर तो कोई रोक है नहीं...अत: इनके आलीशान पांच सितारा आश्रमों में इन तीनों श्रेणियों के महानुभाव आसानी से मिलकर मोलभाव कर सौदा कर सकते है...विभिन्न नियामक तो हैं इस गड़बड़झाले पर नजर रखने के लिये...सो डोन्ट वरी...


इन गुरुओं को अपने भक्तों के आध्यात्मिक और धार्मिक उत्थान का भी बड़ा ख्याल रहता है अत: ये गुरु दक्षिणा के नाम पर अपने भक्तों से कभी कभी कुछ संकल्प भी करवाते हैं जैसे...
१- मैं जीवन भर मांसाहार का सेवन नहीं करूंगा।
२- शराब और सिगरेट-तम्बाकू छोड़ दूंगा।
३- तामसिक भोजन, लहसुन-प्याज आदि का त्याग कर दूंगा।
४- सप्ताह में एक बार कम से कम सत्संग में जाउंगा।
५- रोज सुबह गौमाता को चार रोटी खिलाउंगा।
आदि आदि...
कोई हानि नहीं इन संकल्पों से भी...



अब कल्पना कीजिये उस स्थिति की...यही गुरु लोग गंगाजल भक्तों के हाथ में देकर उन्हें निम्न संकल्प दिलवा रहे हैं...
१- मैं अपने लड़के की शादी में न तो दहेज लूंगा और न बिटिया के विवाह में दूंगा।
२- मैं अपने व्यवसायिक और निजी जीवन में किसी भी तरह की टैक्स चोरी नहीं करूंगा, सरकार को प्रत्येक टैक्स पूरा दूँगा, अपनी इस्तेमाल की गई बिजली और पानी का पूरा दाम चुकाउंगा।
३- मैं किसी तरह की बख्शीश, घूस, रिश्वत या सुविधा शुल्क न तो दूंगा और न ही लूंगा।
४- मैं किसी भी काम के लिये न तो सिफारिश करवाउंगा और न किसी की गलत सिफारिश को मानूंगा।
५- जाति व्यवस्था यानि समाज के कोढ़ को खत्म करने का प्रयास करुंगा और जीवन का कोई भी निर्णय जाति के आधार पर नहीं लूंगा।
६- मैं अपने उद्योग या प्रतिष्ठान में काम करने वाले कर्मचारियों व श्रमिकों का शोषण नहीं करूंगा, उन्हें इतना वेतन दूंगा कि वोसम्मान से सर उठाकर एक उपयोगी जीवन जी सकें तथा मुनाफे में भी कुछ हिस्सा उन को दूंगा।


अगर ये गुरु ऐसा करने लगें तो क्या होगा...???

इन गुरुओं के पंडाल खाली हो जायेंगे...तंबू उखड़ जायेंगे...और इनके भक्तों का स्थान विलुप्त प्राय: जीवों की लिस्ट में आ जायेगा...

काफी कड़वा तो है......मगर यह सच है...

सोमवार, 28 सितंबर 2009

ब्लॉगवाणी आज बन्द हो गया, कल यदि चिठ्ठाजगत भी बन्द हो गया तो...? What to do if this happens ? एक माइक्रो पोस्ट.....

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स्नेही मित्रों,
आलोचना से व्यथित हो ब्लॉगवाणी संचालकों ने आज से इसे बन्द कर दिया...
चिठ्ठाजगत भी हिन्दी सेवा के लिये किया जा रहा एक अव्यवसायिक प्रयत्न ही तो है...कल यदि किसी भी कारण से यह भी नहीं रहा तो ???
आप लोगों में कई ज्ञानी, अनुभवी, आई टी और इंटरनेट तकनीक के महारथी तथा ब्लॉगिंग में काफी पुराने हैं।
क्या आपकी नजर में ऐसा और भी कोई मंच, प्लेटफार्म, वेबसाइट, एग्रीगेटर, तकनीक या तरीका है जिस की मदद से हम सभी हिन्दी ब्लॉगर इसी तरह एक दूसरे के लिखे को पढ़ते रहें, टिपियाते रहें, मौज लेते रहें और पोस्टें ठेलते रहें इस भरोसे के साथ कि वे पाठकों और साथी ब्लॉगरों तक पहुंच ही जायेंगी...
मैं आपको अकारण एक और चिंता नहीं दे रहा परंतु कल अगर सचमुच ऐसा हो गया तब ???

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

यह अस्वच्छ संदेश है अत: गुमराह न होईये...Don't allow anybody to misguide you...

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साफ सुथरे संदेश वाला एक ब्लॉग और उसको चलाने वाले खान साहब ने २३ सितम्बर को एक पोस्ट की है जिसमें धर्म स्थल जैसा शराब खाना और उसकी वजह से रोष के बारे में लिखा है और जैसा कि अक्सर होता है लोग लग गये हैं बिना खोजबीन किये उनकी हां में हां मिलाने...

जब यह पोस्ट छपी थी तब लेखक ने उसके साथ ३ लिंक भी दिये थे जिनमें सबसे पहला लिंक था

http://www.methodshop.com/2006/10/muslims-offended-by-apple-store.shtml

आइये पढ़ते हैं क्या लिखा है इस पेज पर...

10/12/2006
Muslims Offended by Apple Store
| 8:09 AM | ShareThis |


Jason O'Grady from PowerPage.org found an interesting research report that says the 5th Ave Apple Store is offensive to some Muslims. Why? Apparently the glass cube shape of the Apple Store entrance resembles the Ka'ba in Mecca (see image). The report, which was translated by The Middle East Media Research Institute (MEMRI), also finds problems in people referring to the glass cube as the "Apple Mecca," the store being open 24 hours a day like the Ka'ba, and because "alcoholic beverages" are served inside at a bar.

Obviously the offended Muslims in question have never actually been to the 5th Ave Apple Store. The only bar in the Apple Store is the Genius Bar and although the advice of a Genius Bar employee may be intoxicating, it isn't alcoholic. For those of you unfamiliar with the Apple Genius Bar, it's a booth inside the Apple Store where you can bring your broken iPod or computer and have them take a look at it. There are no alcoholic drinks served at the Genius Bar, just knowledge. The purpose of the Genius Bar must have gotten lost in translation. For the record, Apple Stores do not serve alcohol. People getting drunk and playing with expensive computers and iPods probably isn't a good idea.

As far as building a cube shaped store entrance that's open 24 hours a day.... Apple's 100% guilty of doing that. But can a simple glass cube really be blasphemous? Please write a comment below and share your thoughts.

digg story | methodshop

अब कुछ जानिये इस स्टोर के बारे में, देखिये एप्पल फिफ्थ एवेन्यू स्टोर , क्या सोचना है आपका?

अब यहां पर यह भी बताना सामयिक होगा कि यह स्टोर खुल गया था २० मई २००६ को...
Apple inc. ने आज तक कभी इसे Mecca या Kaba कह कर प्रचारित नहीं किया है...

असलियत बताता एक और बेहद खूबसूरत लिंक आपको दे रहा हूं।

महज अपने ब्लॉग को चर्चा में रखने के लिये धर्म के नाम पर साथी ब्लॉगरों को गुमराह करना क्या जायज है?
आपका निर्णय सर माथे पर...
फैसले के ईंतजार में...
आपका ही...
हिन्दी powered by Lipikaar

शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

सेकुलरिस्टों को तो दोनों तरफ से दुत्कार ही मिलनी है.....We don't understand secularism.

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प्रिय पाठक,

अपनी बात शुरू करने से पहले कुछ परिभाषायें:-
स्रोत-Oxford advanced learner's dictionary, 5th edition.
*Secular=not concerned with religious affairs; of this world.
*Secularism= the belief that laws,education,etc should be based on facts,science etc rather than religion.
*Pseudo= not genuine; pretended or insincere.


ज्यादा दिन नही् हुऐ,मुम्बई टाईगर ब्लॉग पर जसवंत सिंह पर की गई एक टिप्पणी की भाषा जायज नही् लगी, विरोध जताया तो अपनी जवाबी टिप्पणी में उन वरिष्ठ ब्लॉगर ने मुझे कह दिया 'स्यूडो सेक्युलर'...
अपने सुरेश चिपलूनकर जी भी 'तथाकथित सेक्युलर','स्यूडो सेक्युलर'और 'वामपंथी सडांध फैलाने वालों' के प्रति अपना गुस्सा अकसर निकालते ही रहते हैं ।


बहुत छोटा था मैं तो किसी किताब में पढ़ा कि हमारे संविधान में लिखा है कि भारत एक Secular, Socialist, Democratic, Republic है, इन बड़े बड़े शब्दों के अर्थ पढ़े और ठाना कि मैं भी Secular, Socialist और Democrat बनूंगा।


तो मित्रों, सबसे पहले दी गई परिभाषाओं के आधार पर जो आदमी यह मानता है कि किसी मुद्दे पर उसके विचार और राय तथ्य, तर्क, कानून और विज्ञान पर आधारित हो तथा उसके अपने धर्म संबंधी किसी भी पुर्वाग्रह से मुक्त हो, वह आदमी सेक्युलरिस्ट है। सही है कि नहीं ?


अब आता हूं भगवा ध्वज वाहकों पर , निम्न कथनों पर गौर कीजिये...

१-विवादित धर्मस्थल के मामले में अदालत का आदेश यदि हमारे पक्ष में आया तो हम उसे मानेंगे अन्यथा नहीं क्योंकि आस्था के फैसले अदालतों द्वारा नहीं दिये जा सकते।
२-हमारा धर्म कई करोड़ साल पुराना है भले ही आधुनिक आदमी का इतिहास महज कुछ हजार सालों का ही हो।
३-हमारे स्वर्णिम प्राचीन काल में यद्यपि पशु शक्ति व लकड़ी जलाकर उर्जा प्राप्त करने के अतिरिक्त उर्जा के किसी स्रोत के सबूत नहीं हैं फिर भी हमारे पुरखों ने विमान (पुष्पक आदि), आणविक अस्त्र (ब्रह्मास्त्र),टेस्ट ट्यूब बेबी(कौरव) आदि आदि सब बना लिये थे।
४-हम तो मानते हैं कि हमारे मिथक और इतिहास एक ही हैं इनमें कोई भेद हमें स्वीकार नहीं।
५-लाल किला, कुतुब मीनार, ताज महल आदि आदि जो भी पुरानी प्रसिद्ध इमारतें हैंवो हमारे धर्म के शासकों ने बनाई, दूसरे धर्म के शासकों ने अपने शासन काल में उन्हें स्वयं द्वारा बनाया प्रचारित कर दिया।
६-एक पशु विशेष को हम पूजते हैं, उसका गोबर और मूत्र भी हमें प्यारा है हरेक को इनका सेवन करना चाहिये, घर में गोबर लीपना चाहिये, वस्त्रों को शुद्ध करने के लिये मूत्र को उन पर छिड़क सकते हैं यह दीगर बात है कि इसी पशु के दूध देना बन्द कर देने पर हम इन्हें सड़कों पर आवारा छोड़ देते हैं (क्या आपने कभी सड़क पर घूमती आवारा भैंस देखी है?)

अब यदि उपरोक्त कथनों से सहमत हैं तो आप सच्चे सेक्युलर हैं यदि नहीं तो आपको 'स्यूडो सेक्युलर','तथाकथित सेक्युलर', 'वामपंथी सडांध फैलाने वाले' 'अल्प संख्यक तुष्टिकरण समर्थक' आदि कहकर दुत्कारा जायेगा...


इसी तरह से हरा झंडा थामे हैं कुछ लोग,उनके कथनों पर गौर कीजिये:-

१-विवादित धर्मस्थल मामले में यदि अदालत का फैसला हमारे पक्ष में है तो मानेंगे अन्यथा नहीं क्योंकि हमारे धर्मग्रंथ के अनुसार जो जगह एक बार हमारा पूजास्थल बन गई वह सृष्टि के अंत तक पूजास्थल ही रहेगी।
२-हमारा धर्म भी कोई १४००-१५०० साल पुराना नहीं बल्कि सृष्टि की शुरुआत से चला आ रहा है।
३-मेडिकल साइंस, गणित, विज्ञान, ऐस्ट्रोनोमी आदि आदि में जो कुछ आज खोजा जा रहा है उसे हम लोगों ने पहले ही जान लिया था।
४-किसी भी दुनियावी मसले पर हम मानेंगे वही तथा वही राय रखेंगे जो हमारे धर्मग्रंथों में लिखा है या जो फतवा हमारे धर्मगुरु देते हैं, तर्क, तथ्य,विज्ञान और कानून से हमें कोई मतलब नहीं। सारी दुनिया आज हमारे खिलाफ साजिश कर रही है।
५-इतिहास भले ही कुछ कहे हमारे धर्म के शासकों ने कोई धर्मस्थल नही् तोड़ा,न धर्मान्तरण कराया न जजिया लिया। इस देश का प्राचीन धर्म तो हमारा ही धर्म है ये तो बाद में गुमराह लोगों ने दूसरा धर्म अपना लिया। हमारे संदेष्टा ही तो अंतिम अवतार हैं।
६-एक पशु विशेष जो हमारे धर्म में निषेध है, उसे दुनिया में रहने का हक नहीं, न कोई इसे पाले और न खाये और तो और यह पशु तो पक्का लूज कैरेक्टर है हमें पता चला है कि यह अपनी मादा को दूसरे नरों को ऑफर करता है।

अब यदि उपरोक्त कथनों से सहमत हैं तो आप सच्चे सेक्युलर हैं यदि नहीं तो आपको 'स्यूडो सेक्युलर','तथाकथित सेक्युलर', 'वामपंथी सडांध फैलाने वाले' 'बहुसंख्यक प्रभुत्ववादी ' आदि कहकर दुत्कारा जायेगा...



अब आप ही बताओ मित्रों सेक्युलरिस्ट अगर जायें तो जायें कहां.....

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

सुरेश चिपलून्कर जी और स्वच्छ संदेश : हिन्दोस्तान की आवाज वाले सलीम खान साहब से कुछ सीखो मेरे साथी चिठ्ठा कारों ...Respect disagreement also...

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प्रिय मित्रों,
यूं बात है तो छोटी सी पर मुझे लगता है कि कम से कम अपना विरोध तो दर्ज करा ही दूं।
मैं बात कर रहा हूं टिप्पणी मॉडरेशन की, हर कोई टिप्पणी मॉडरेशन लगाये बैठा है, यहां तक कि कविता के चिठ्ठों पर भी,पिछले १४ दिनों में मेरी ही तकरीबन ४-५ टिप्पणियां इस मॉडरेशन की भेंट चढ़ चुकी हैं, रवैया यह है 'मीठा मीठा गप और दूसरा कोई भी स्वाद थू'
अब आप सुरेश जी या सलीम साहब का उदाहरण लें, विवादास्पद मुद्दे उठाने के बाद भी वे हर टिप्पणी को सम्मान से प्रदर्शित करते हैं जबकि कई में उनके ऊपर खुला आक्षेप लगा होता है, यह है असहमति का भी सम्मान जो हमारा और हर लोकतान्त्रिक समाज का स्टैन्डर्ड होना चाहिये।
कुछ चिठ्ठाकार तो इतने दोगले हैं कि दूसरों के पास जाकर तो बड़े खुल कर टिप्पणी देते हैं परंतु खुद के ब्लॉग पर वाटर टाइट मॉडरेशन है।
सोचो मित्रों....
क्या हम सही कर रहे हैं?
हमारे ब्लॉगिंग जगत के भविष्य के लिये क्या यह घातक प्रवृति नहीं, कहीं ऐसा न हो कि ब्लॉग जगत पर एक सा सोचने वालों का ही एकाधिकार हो जाये...

LET THOUSAND FLOWERS BLOOM,

LET EACH AND EVERYONE'S OPINION MATTER.

आमीन...

सोमवार, 7 सितंबर 2009

'बिल्ले वीर जी' की तो गालियों में भी हम सब की बरकत़ है...

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तीन बरस बाद हर साल की तरह फिर हुआ ट्रान्सफर
एक नये शहर को घर शिफ्ट करने की फिर वही कवायद
सामान शिफ्ट करवाने को गया कईयों बार ट्रान्सपोर्ट तक
परिवहन नगर में ही हुई मुलाकात 'बिल्ले वीर जी' से

बरगद के नीचे चबूतरे पर बैठा हुआ था वह बूढ़ा सरदार
उम्र उसकी रही होगी तकरीबन पचहत्तर बरस के पार
ड्राइवरों में से ही एक सुलझा रहा था उसके उलझे बाल
दो अन्य पगड़ी को उसकी कर रहे थे बांध कर तैयार
बूढ़ा बहुत जोर से गरिया रहा था उन्हीं में से किसी को
यह महाशय हैं कौन? पूछ ही बैठा मैं गुरबख्शानी से

अरे साहब यह तो 'बिल्ले वीर जी'हैं ट्रान्सपोर्ट वालों के
यहां का हर दुसरा शख्स रोटी खाता है उनके करम से
हर डरेवर के या तो उस्ताद रहे हैं या उस्ताद के उस्ताद
अपने बाप से बढंकर मानते हैं उनको हम ट्रान्सपोर्ट वाले
साहब'बिल्ले वीर जी'की गालियों में भी हमारी बरकत है

दस बरस की उम्र में क्लीनर बना बलविन्दर उर्फ'बिल्लू'
पूरी डरेवरी करने लगा महज सोलह बरस का था वो जब
बिल्लू से 'बिल्ला' का सफर सरपट तय कर दिया उसने
बताने वाले बताते हैं बहुत ही सख्त उस्ताद था 'बिल्ला'
जिंदगी में किसी क्लीनर को नहीं रखा एक साल से ज्यादा
छह महीने में डरेवरी सिखाता और एक साल बाद भगा देता
साले हरामी डरेवरी कर अब तू नहीं रहा क्लीनरी के लायक

'बिल्ला' को गाड़ी हमेशा अपनी जान से भी प्यारी होती थी
उसके सिखाये डरेवर कभी नाकामयाब नहीं हुऐ ट्रान्सपोर्ट में
बिल्ला बना 'बिल्ले वीर जी' धंधे में नई पीढ़ी के आने पर

वीर जी ने गाड़ी तो चलाई होगी कम से कम पचास साल
दस बरस पहले ड्राइवरी छोड़ी साफ नहीं दिखता अब उनको
भरा पूरा घर है हैं खूब इज्जत देने वाले बेटे, बहुऐं ,पोते
आज तक कभी भी वीर जी ने पूरा दिन घर में नहीं बिताया
ठीक सुबह सात बजे रिक्शा पकड़ पहुंच जाते हैं ट्रान्सपोर्ट पर


उस्ताद को नहलाना,कपड़े धोना,पगड़ी पहनाना,खाना खिलाना
हंसाना,कभी गुस्सा दिलाना,गालियां खाना ये काम है चेलों का
सूरज ढलने के बाद ही कोई वीर जी को घर आता है छोड़ कर

सजकर तैयार होने के बाद जब भी कोई गाडी़ जाती है लोकल में
बिल्ले वीरजी भी जरूर जाते हैं ड्राइवर के ठीक बगल में बैठकर
रास्ते में अगर गलती हो तो डरेवर को मिलती हैं जमकर गालियां
नजर बचाके स्टीयरिंग को सहलाते हैं मानो दुलार रहे हों बच्चे को

ज्ञानी कहते हैं एक उम्र के बाद सांसे चलती हैं किसी के सहारे ही
अपने बिल्ले वीरजी को नहीं चाहिये सहारा किसी सर्वशक्तिमान का
उनकी सांसे तो बसी हैं ईंजन में,स्टीयरिंग में, डरेवरों के साथ में......

रविवार, 30 अगस्त 2009

मोहम्मद इकराम कुरैशी़ की दुकान पर दोबारा.........

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बहुत सालों बाद इस बार गया, अपने पुराने शहर...
रक्षाबंधन पर हर साल पानी बरसता है मेरे शहर में...
थोड़ी देर ही सही,पर परंपरा निभाई बादलों ने इस बार भी...
सुबह थोड़ी देर बरसा, फिर खुल गया आसमान...
और इसी के साथ उड़ने लगीं खूब सारी रंग बिरंगी पतंगें...
पतंग उड़ाते बच्चों को देख जाग गई सब पुरानी यादें...
तभी अनायास याद आ गया अपना 'इक्कू मोटा'...
घर से निकला आज मिल कर आउंगा उसकी दुकान पर...



हाँ, पूरा नाम था उसका, मोहम्मद इकराम कुरैशी़...
साथ साथ पड़ते थे हम शहर के सरकारी स्कूल में...
उतना मोटा तो नहीं था,पर हम सब में तगड़ा था...
उसी की वजह से बड़े रौब से चलते थे हम सब...
जब 'इक्कू मोटा' साथ होता,पिटते कम,पीटते ज्यादा...
पढ़ाई में तो ज्यादा मन नहीं ही लगता था उसका...
मगर उसके जैसा खिलाड़ी,नहीं देखा मैंने आज तक...
खेल कोई भी हो,उस्ताद था वो सभी खेलों का...
कंचे खेलता जीत ले जाता हम सबके सारे कंचे...
क्रिकेट में बाउन्ड्री के पचासों गज बाहर गिरते उसके शॉट...
फुटबाल तो मानो चिपक जाती थी पैर से 'इक्कू' के...
मेरी याद्दाश्त में कैरम में भी नहीं कोई जीत पाया उससे...



पर इन सबसे बढ़कर उसकी पतंगबाजी याद है मुझे...
इधर इक्कू मोटे की पतंग उड़ी तो लोग उतार लेते थे अपनी...
मांझे,सद्दी और पतंग से मानो एकाकार हो जाता था वो...
चील सा झपट्टा मारती उसकी पतंग,जब तक कुछ समझ आये...
'वो काट्टा'चिल्लाते हुए नाच रहा होता हमारा 'इक्कू मोटा'...
उसकी पतंग उड़ने के थोड़ी देर बाद साफ हो जाता आसमान...
'है कोई और'चुनौती देती उड़ती रहती सिर्फ उसी की पतंग...



भीड़ से बचता बचाता जब पहुंचा उस की दुकान पर...
काउंटर पर बैठा मछली साफ कर तौल रहा था वो...
'अबे साले इक्कू' की जगह बोला "कैसे हो इकराम भाई"...
'स्साले पॉन्डी तेरी तो'की जगह वो बोला"कैसे हो साहब"...
"साहब होंउगा दूसरों का, तुम्हारे साथ तो खेला हूँ मैं"...
"अरे नहीं,फिर भी आपकी इज्जत का लिहाज रखना होता है"...
मैंने मिलाने को हाथ बढ़ाया काउंटर के उस पार...
कलाई थमा दी उसने,बोला हाथ गंदे हो जायेंगे आपके...
आज राखी के दिन भी पतंग नहीं उड़ाओगे? पूछा मैंने...
अब हमारे दिन कहां? बेटा गया है आज उड़ाने, बोला वो...
शुगर बढ़ी रहती है इन्सुलिन से भी काबू नहीं,बतलाया उसने...
थोड़ी देर कुछ इधर उधर की बातें की,उसने चाय पिलाई मुझे...



"अच्छा भाई चलता हूँ फिर आउंगा कभी" बोलकर विदा ली मैंने...
मेरी स्मृतियों के आइने में कहीं कुछ चटख गया उस रोज...



अब दोबारा कभी नहीं जाउंगा, मोहम्मद इकराम कुरैशी़ की दुकान पर...
मैं अपनी यादों के 'इक्कू मोटे' को, रखना चाहता हूँ जस का तस...

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

पापा क्या आपके बॉस को नहीं पता..

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मंदी के इस भयावह दौर में
टारगेट पूरे करने और नौकरी बचाने की जद्दोजहद में
रोजाना रात नौ बजे घर पहुंचता हूँ मैं
नहीं मिली एक महीने से कोई छुट्टी
इतवार या त्यौहार की भी नहीं

रोजाना सुबह स्कूल जाने से पहले
कह कर जाती है मेरी बिटिया
पापा जरूर अपने बॉस को कहना
जल्दी घर जाना है आज मुझे
आप आफिस से जल्दी आओगे
तो पहले हन दोनों चलेंगे कालोनी के पार्क
खूब खेलूंगी जहां मैं आपके साथ
फिर आप मैं और मम्मी जायेंगे बाजार
मैं तो ढेर सारी आइसक्रीम खाउंगी
रात का खाना खायेंगे घर से बाहर
इस तरह खूब मजा करेंगे हम लोग

रोज उसे प्रॉमिस करके निकलता हूं घर से
पिस जाता हूँ काम की चक्की में फिर से
थका हारा पहुंचता हूँ वही रात नौ बजे
सोने की तैयारी कर रही होती है मेरी बेटी
बहुत गुस्सा दिखाती है बड़ा मुंह फुलाती है
पापा आज मैं आप से एकदम कुट्टा हूं
उसे मनाता हूं सुलाता हूं खुद भी सोता हूं
उसके बचपन की खुशियों को रोजाना खोता हूं

आज एक बार फिर देर से पहुंचा मैं घर
बिल्कुल नाराज नहीं हुई वो न मुंह फुलाया
मेरी पीठ पर चढ़ी बांहौं में लपेटा मुझको
बार बार चूमा मेरे सिर, गर्दन और चेहरे को
फिर फुसफुसाते हुए कान में किया वो सवाल
पापा क्या आपके बॉस को इतना भी नहीं पता?
कि घर में सोना आपका इंतजार करती है

नि:शब्द निरुत्तर हूँ मैं
समझाने या दुलारने की हिम्मत नहीं मुझमें
काश.....
सारी दुनिया के ये 'बॉस' लोग सुन पाते
मेरी छोटी सी बिटिया का ये बड़ा सवाल...
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बुधवार, 26 अगस्त 2009

लो उतर आईं आखिरी चार लाईनें भी...

मेरा मानना है कि हर शख्स के भीतर अनेकों कवितायें होती हैं बस मुश्किल होता है उनका कागज पर उतरना....
तो ये हैं अंतिम चार लाइनें..



चुप रहना सीख ले,या झूठ को दे सम्मान ,
लोक तंत्र में सच बोलने, पर बवाल हो सकता है।


बतला तो तुम रहे हो,पर नहीं मुझे यकीं,
इस नाचीज का उनको,इतना ख्याल हो सकता है।

रविवार, 23 अगस्त 2009

चार लाइनें.और भी..

ये वो हंगामा नहीं, बदल डाले जो दुनिया को,

बासी कढ़ी में आया,नया उबाल हो सकता है।



अभी भी देर नहीं हुई, कद्र हमारी जान लो,

वरना इस चूक का ,तुम्हें मलाल हो सकता है।

चार और लाइनें...

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मजबूती से थमा गिलास, फिसल कर बिखर गया,
ऐसा तो सिर्फ उन्हीं, निगाहों का कमाल हो सकता है।

तूने गौर से देखा था? मेरे मेहबूब के माथे को..
सिंदूर तो नहीं ही होगा , गुलाल हो सकता है।

रविवार, 16 अगस्त 2009

मेरी चार लाइनें( पूरी रचना आनी अभी बाकी है।)

आज तेरे सामने, जो मिट्टी में लोट रहा।
वही कृष्ण कल,पूतना का काल हो सकता है।

न तेरा हरा है, न मेरा केसरिया होगा।
लहू का रंग तो, केवल लाल हो सकता है।