सोमवार, 28 दिसंबर 2020

जीवन क्या है ?

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कल अचानक


कहने लगी बेटियाँ

पापा, कुछ समय से

लगने लगे हो आप

एकदम दादाजी से


बातें वैसी ही करते हो

हो बोलते उनकी तरह  

चलते-फिरते, उठते-बैठते

भी दिखते हो दादा से


खुद को शीशे में देखा

अपने अंतर में भी झाँका

पाया सही कह रही बेटियाँ

पिता तो कहीं गये ही नहीं


वो उग गये मेरे भीतर

अनायास औ बेआवाज़

उसी तरह जैसे किसी

बीज से उगा नवांकुर


ऐसे ही एक दिन मैं भी

बेटियों के भीतर अपनी

उग जाऊँगा अनायास ही

पता तलक न चलेगा उनको


पिता अमर हैं

मैं भी अमर रहूँगा

यही है जीवन भी

मैं ही तो जीवन हूँ !


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