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कई हजार साल का सभ्य इंसान का यह सफर और उतना ही पुरानी दास्तान सभ्यता की... फिर भी हैरान करने वाली बात यह है कि हमारी यह दुनिया कभी भी न्यायपूर्ण नहीं रही... इसमें मालिक रहे व गुलाम भी... शोषक रहे व शोषित भी... शासक रहे व शासित भी.. सबके लिये न्याय के, सबको समानता के, हर किसी के लिये समान अवसरों के दावे तो हमेशा हुऐ, हो रहे हैं और होते ही रहेंगे... पर कहाँ क्या कमी हो जाती है कि यह सब संभव नहीं हो पाता... क्यों नहीं मानव जाति की सामूहिक चेतना जग कर इंकलाबी परिवर्तन लाती है निजाम में, सोचा है कभी...
क्यों लुटेरे-चोर-भ्रष्ट-माफिया-अपराधी-शोषक के खिलाफ नहीं खड़ा होता हुजूम... क्यों उसी के सताये उसी के घर-आफिस-मिल-फैक्ट्री-दुकान में उसी की सिर झुका कर नौकरी करने व उसका हुकुम बजाने में ही जिंदगी बिता ले जाते हैं... क्यों नहीं होती बगावत... क्यों रहती है बरकरार यथास्थिति... क्यों नहीं बहने पाती बयार बदलाव की, सोचा है कभी...
पहला है कर्म व कर्मफल की अवधारणा...
दबा-कुचला-शोषित अपने ही दुश्मन (शोषक) के हित साधने व उसकी ही चाकरी करने में यह सोच लगा रहता है कि 'प्रभु' तबका आज यह जो मलाई उड़ा रहा है और उसे जो आज यह सूखी रोटी भी नसीब नहीं यह पूर्व के करमों का फल है दोनों के लिये... बिना किसी बदलाव की चाह या जरूरत महसूस किये वह बिता देता है जिंदगी... इस उम्मीद के साथ कि इस जनम के दुख-मुफलिसी को चुपचाप-बिना विरोध झेलने के कर्म के बदले में अगले जनम वह भी 'प्रभु' वर्ग में जनमेगा...
और दूसरा कारण है 'फैसले' का विधान...
शोषक यह सोचता है कि किसी तरह ऊपर वाले को खुश रख ले... गुनाह रोज करे और उसके सामने हर रोज माफी भी मांगता चले... लूट के माल का कुछ हिस्सा ऊपर वाले के काम में लगा दे... तो फैसला यकीनन उसी के हक में आयेगा... शोषित इस दुनिया में ही सबको समय से उसके करमों के मुताबिक न्याय मिलने की व्यवस्था को सुनिश्चित करने की ओर रूचि नहीं दिखाता... झेलता रहता है जुल्मों को...इस उम्मीद के साथ कि आखिरी फैसला तो उसी के हक में आना है...
अब अगर कोई कहता है कि :-
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कई हजार साल का सभ्य इंसान का यह सफर और उतना ही पुरानी दास्तान सभ्यता की... फिर भी हैरान करने वाली बात यह है कि हमारी यह दुनिया कभी भी न्यायपूर्ण नहीं रही... इसमें मालिक रहे व गुलाम भी... शोषक रहे व शोषित भी... शासक रहे व शासित भी.. सबके लिये न्याय के, सबको समानता के, हर किसी के लिये समान अवसरों के दावे तो हमेशा हुऐ, हो रहे हैं और होते ही रहेंगे... पर कहाँ क्या कमी हो जाती है कि यह सब संभव नहीं हो पाता... क्यों नहीं मानव जाति की सामूहिक चेतना जग कर इंकलाबी परिवर्तन लाती है निजाम में, सोचा है कभी...
क्यों लुटेरे-चोर-भ्रष्ट-माफिया-अपराधी-शोषक के खिलाफ नहीं खड़ा होता हुजूम... क्यों उसी के सताये उसी के घर-आफिस-मिल-फैक्ट्री-दुकान में उसी की सिर झुका कर नौकरी करने व उसका हुकुम बजाने में ही जिंदगी बिता ले जाते हैं... क्यों नहीं होती बगावत... क्यों रहती है बरकरार यथास्थिति... क्यों नहीं बहने पाती बयार बदलाव की, सोचा है कभी...
क्यों अपने ही हमनस्लों के हक को मारकर... अपने ही भाई-बहनों के हिस्से की खुशियों को छीनकर... अपने ही जैसे इंसानों की दुनिया को अंधेरा कर... उन्हें भूख-गरीबी-मजबूरी-जहालत की जिंदगी के लिये मजबूर कर... चोरी-फरेब से कमाये-बनाये अपने महलों में अपने बीबी बच्चों अपने परिवार के साथ ठहाके लगाते इतराते बेखौफ चैन की नींद सो पाता है कोई, सोचा है कभी...
पहला है कर्म व कर्मफल की अवधारणा...
दबा-कुचला-शोषित अपने ही दुश्मन (शोषक) के हित साधने व उसकी ही चाकरी करने में यह सोच लगा रहता है कि 'प्रभु' तबका आज यह जो मलाई उड़ा रहा है और उसे जो आज यह सूखी रोटी भी नसीब नहीं यह पूर्व के करमों का फल है दोनों के लिये... बिना किसी बदलाव की चाह या जरूरत महसूस किये वह बिता देता है जिंदगी... इस उम्मीद के साथ कि इस जनम के दुख-मुफलिसी को चुपचाप-बिना विरोध झेलने के कर्म के बदले में अगले जनम वह भी 'प्रभु' वर्ग में जनमेगा...
और दूसरा कारण है 'फैसले' का विधान...
शोषक यह सोचता है कि किसी तरह ऊपर वाले को खुश रख ले... गुनाह रोज करे और उसके सामने हर रोज माफी भी मांगता चले... लूट के माल का कुछ हिस्सा ऊपर वाले के काम में लगा दे... तो फैसला यकीनन उसी के हक में आयेगा... शोषित इस दुनिया में ही सबको समय से उसके करमों के मुताबिक न्याय मिलने की व्यवस्था को सुनिश्चित करने की ओर रूचि नहीं दिखाता... झेलता रहता है जुल्मों को...इस उम्मीद के साथ कि आखिरी फैसला तो उसी के हक में आना है...
और इसी तरह मुलतवी होता रहता है... एक ऐसी दुनिया का वजूद में आना... जहाँ सभी को उनका इंसानी हक और इंसाफ मिलता हो...
अब अगर कोई कहता है कि :-
एक न्यायपूर्ण दुनिया के अस्तित्व में आने की राह में सबसे बड़ी बाधा हैं 'कर्मफल' व 'फैसले' की धार्मिक अवधारणायें !!!
तो क्या कुछ गलत कहा जा रहा है यहाँ पर ?
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