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गुवाहाटी की घटना ने देश के मानस को मानो झकझोर सा दिया है... प्राइमटाइम टेलीविजन पर वीडियो आने का यह कमाल है... पर महिलाओं के साथ इस तरह का सलूक क्या केवल गुवाहाटी में ही हुआ, बाकी जगह नहीं होता ?... नंगी हकीकत तो यह है कि इस तरह के तमाम वाकये होते रहते हैं देश भर में... बस इनके वीडियो नहीं बन पाते... और फिर पीढ़िता को उसकी इज्जत का हवाला दे या समझौता आदि कर निपटा दिये जाते हैं...
जिस समय गुवाहाटी की यह घटना चर्चित होती है ठीक उसी समय बागपत के असारा गाँव की एक खाप पंचायत ऐलान कर देती है कि चालीस साल से कम उम्र की कोई औरत अकेले बाजार नहीं जायेगी, शाम को घर से बाहर घूमने नहीं निकलेगी, मोबाईल नहीं रखेगी, चेहरा ढकेगी... और प्रेम विवाह को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा... पंचायत ने यह नहीं बताया कि जो लड़की यह सब नहीं मानेगी उसके साथ क्या होगा... पर आप कल्पना कर सकते हैं कि इन फरमानों को जो भी लड़की अनसुना करने की हिम्मत करेगी, खाप पंचायत के फैसले की आड़ में लंपटों की भीड़ उसके साथ जो कुछ सलूक करेगी वह कुछ-कुछ गुवाहाटी जैसा ही होगा...
आखिर गुवाहाटी के वह लंपट भी तो पीढ़िता को उसके नाइट क्लब जाने, पाश्चात्य परिधान पहने व कथित रूप से शराब पीने के ' महान अपराध ' के लिये ही तो अपनी नजर में 'सबक' सा सिखा रहे हैं...
प्रतिक्रियायें बड़ी रोचक हैं इन दोनों मामलों पर... गुवाहाटी के मामले की निंदा हो रही है चहुंओर, और जल्दी से जल्दी ' डर्टी डजन ' को पकड़ने के लिये दबाव बनाया जा रहा है... लेकिन कहीं न कहीं इस सब चर्चा के बीच आंचल, घूंघट व पर्दे वाली महान भारतीय संस्कृति को भी याद किया जा रहा है... यह भी पूछा जा रहा है कि क्या जरूरत थी उन्नीस बरस की पीढ़िता को उस समय पर उस जगह जाने की... ठीक उसी तरह असारा गाँव की खाप पंचायत के फरमान को परिवार के बड़ों द्वारा अपने परिवार के अंदरूनी मामलों को संभालने की एक कोशिश, जो कि उनका जायज हक भी है, के रूप में देख-दिखा रहे हैं कुछ लोग...
एक सालाना कार्यक्रम भी आप देखते ही होंगे खास तौर पर १४ फरवरी के आस पास... रेस्टोरेंट्स, होटलों व बाजारों व पार्कों में घूमते युवा जोड़ों को घेर लेते हैं भारतीय संस्कृति के स्वयंभू पहरेदार... कहीं उनसे कान पकड़वाये जाते हैं, कहीं मुर्गा बनाया जाता है, कहीं कालिख पोती जाती है, कहीं लड़की के घरवालों को मोबाइल से बुलाकर लड़की उनके सुपुर्द की जाती है... हद तो तब हो जाती है कि कहीं कहीं पर पुलिस भी इस सब में सक्रिय भागीदारी दिखाती दिखती है...
कुल मिलाकर मतलब यही है कि हममें से अधिकाँश एक साँस में तो गुवाहाटी जैसे मामलों की निंदा करते हैं... पर दूसरी साँस में यह भी नसीहत दे डालते हैं कि महिलायें ऐसा कुछ करने से बचें, ऐसी स्थितियों में आने से बचें जहाँ उनके साथ ऐसा कुछ हो सकता है... हमारे प्राचीन भारत में ऐसा नहीं होता था... ठीक इसी तरह एक साँस में हम असारा जैसे फरमानों की निंदा करते हैं और दूसरी साँस में यह भी कह डालते हैं कि वह गाँव वाले जिस तरह रहना चाहें यह उनकी मर्जी, बुजुर्गों को बच्चों की भलाई के लिये इस तरह की सलाहें देने का हक है और उनकी बात में भी कुछ वजन है, पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में नयी पीढ़ी बिगड़ रही है आदि आदि ब्ला ब्ला ...
क्या आपने कभी भी स्पष्ट तौर पर हमारे नीति निर्धारकों को, हमारे नेताओं को, पुलिस प्रशासन के अधिकारियों को यह कहते सुना है कि...
" भारत का हर नागरिक, चाहे पुरूष हो या महिला, उसे हर वह कपड़ा पहनने का हक है जिसे हमारा कानून अश्लील नहीं मानता, उसे हर उस जगह पर जाने का हक है जो कानूनन खुली है, उसे उस समय तक इन जगहों पर जाने की इजाजत है जिस समय तक इन जगहों के खुलने की इजाजत कानून देता है, इन जगहों पर जा उसे हर वह चीज खाने या पीने की आजादी है जो कानूनन कोई खा-पी सकता है, उसे मोबाइल फोन रखने की आजादी है क्योंकि मुल्क का कानून इसके खिलाफ नहीं है, बालिग होने के बाद यह उसकी मर्जी है कि किसके साथ रहे, किससे प्रेम करे या किससे विवाह करे, मुल्क का कानून उसे यह आजादी देता है...
और जो कोई भी, किसी भी भारतीय नागरिक के ऊपर लिखे अधिकारों को नहीं मानता... जबरदस्ती उसमें दखल देता है... चाहे यह दखल संस्कृति रक्षा के नाम पर ही हो... एक सभ्य लोकतांत्रिक समाज में उसकी एक ही जगह है और वह है जेल की सलाखों के पीछे ! "
तो मित्रों, जिस दिन से हमारा हर गला दोगलापन छोड़ यह सब कहेगा, स्थितियाँ बदल जायेंगी...
मगर वह दिन अभी तो काफी दूर है... : (
आज के दिन तो हमारे अधिकाँश गले दोगली बातें ही करते रहते हैं...
और, अधिकाँश गलों से दोगली बातें करने वाले किसी भी समाज में यह सब तो होता ही रहेगा...
नियमित रूप से होती हैं और होंगी यह घटनायें...
इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये किसी को भी...
आभार !
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शुभकामनायें आपको ..
प्रत्युत्तर देंहटाएंpraveen
प्रत्युत्तर देंहटाएंyou are 100 percent right and well documented post
regds
rachna
पर ये दोगलापन खत्म कैसे होगा?
प्रत्युत्तर देंहटाएंद्विवेदी साहब .मैं समझता हूँ कि ये दोगलापन तभी जाकर ख़त्म होगा, जब लोग निस्वार्थ होंगे और जुडीशियरी विरादरी के लोग संविधान और क़ानून की गलत व्याख्या करना छोड़ेंगे !
हटाएंकाम गंदे सोंच घटिया
प्रत्युत्तर देंहटाएंकृत्य सब शैतान के ,
क्या बनाया ,सोंच के
इंसान को भगवान् ने
फिर भी चेहरे पर कोई, आती नहीं शर्मिंदगी !
क्योंकि अपने आपको, हम मानते इंसान हैं !
अफ़सोस तो अपने देश के इस महिला आयोग पर भी होता है शाह जी, जिसे यह(बागपत) महिलाओं पर हमला नहीं लगता ! ये इनका तथाकथित युवराज यहाँ जाकर डेरा डालकर दिखाए !
प्रत्युत्तर देंहटाएंबस, इन्तजार करो एक-आद दशक का फिर बागपत क्या पूरे देश में यही तालीबानी क़ानून होगा,
अगर ये दोगले समय रहते नहीं जागे तो !
Check your Spam box Shah ji
प्रत्युत्तर देंहटाएंदोगली बातें और गली कूंचे का व्यभिचार अब सड़क पर आ चुका है -दोषी कौन ?
प्रत्युत्तर देंहटाएंजब भी इस तरह की घटनाएं होती हैं...या फिर उनकी खबर मिलती है...(जैसा आपने लिखा है...घटनाएँ तो होती ही रहती हैं...कम ही सामने आ पाती हैं...)
प्रत्युत्तर देंहटाएंघटना पर लोगों की प्रतिक्रिया स्वरुप उनकी मानसकिता देखने को मिलती है...और हतप्रभ रह जाना पड़ता है.
इसी घटना से सम्बंधित एक पोस्ट लिखी है....उसपर लोगों की प्रतिक्रिया देखकर पता चलता है...अभी नारी के लिए कितना संघर्ष बाकी है.
इस तरह की घटनाओ को कुछ लोग मौके के रूप में देखते है लड़कियों को और बंधन में जकड़ने के लिए हमारे लिए भी ये मौका है ये देखने के लिए की किस किस की क्या मानसिकता है | जब से ब्लॉग जगत में आई हूं अपनी बेटी को कैसे बड़ा करना है उसे क्या क्या सीखना है और किसी तरह से लोगों की मानसिकता से कैसे डील करना है ये सब कुछ मेरे लिए और भी साफ हो गया है कुल मिला कर अब मै उसे और बेहतर तरीके से सिखा सकती हूं |
प्रत्युत्तर देंहटाएंकिसी अनुशासन को सामूहिक रूप से माने बिना समस्याओं का निराकरण असंभव है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंएक दो व्यक्ति के असामान्य होने की बात मानी जा सकती है ..
प्रत्युत्तर देंहटाएंपर पूरा जत्था या ग्रुप गलत काम कैसे कर लेते हैं ??
क्या संस्कार मिला है उन्हें ??
ताज्जुब तो होता ही है ..
एक नजर समग्र गत्यात्मक ज्योतिष पर भी डालें
एक बार फिर आयी कुछ प्रश्न लेकर
प्रत्युत्तर देंहटाएंदोगलापन - क्या इसकी परिभाषा एक हैं या व्यक्ति से व्यक्ति के लिये बदलती हैं
मुद्दे से मुद्धे के लिये भिन्न होती
चिन्तनीय परिस्थितियाँ..
प्रत्युत्तर देंहटाएं