गुरुवार, 5 जुलाई 2012

युवाओं के सपने छीनता, हौसले तोड़ता एक मूर्खतापूर्ण कदम है यह....


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एजुकेशन यानी शिक्षा आज का नया 'सन राइज' उद्मोग है... यह सचमुच बड़ी हैरत में डालता है कि किस तरह खामोशी से चाहे पक्ष हो या विपक्ष सभी सरकारों ने शिक्षा देने की अपनी जिम्मेदारी से मुँह मोड़ लिया है और निजी क्षेत्र को मनमानी करने की खुली छूट दे दी है... नतीजा है कि कुकुरमुत्तों की तरह निजी विश्वविद्मालय उग आये हैं परिदॄश्य पर... और खुल गयें हैं सेन्ट्रल एसी युक्त वाई-फाई सुविधाओं वाले जीपीएस व एसी युक्त बसों वाले स्कूल भी... पर शिक्षा का यह माफिया अभी इस सब से संतुष्ट नहीं... यह माफिया ऐसी स्थितियाँ पैदा कर देना चाहता है कि हर नागरिक के लिये अपने बच्चे को इनके स्कूलों में पढ़ाना उसकी मजबूरी बन जाये, चाहे इसके लिये उसे अपना घर-जमीन व जमीर भी बेचना पड़ जाये...

कोचिंग क्लासों पर लगाम लगाने व स्कूलों के बोर्ड एक्जाम को महत्ता देने के नाम पर उठाया गया यह यह कदम (लिंक). भी कुछ ऐसा ही है... कहा जा रहा है कि अब IIT's में प्रवेश सभी वर्गों के वही विद्मार्थी ले पायेंगे जो अपने अपने वर्ग में अपने बोर्डों के टॉप २० पर्सेन्टाइल में आते हों यानी उनके वर्ग के अस्सी फीसदी बच्चे इम्तहान में उनसे कम अंक पायें हों... अब सोचिये क्या इससे कोचिंग क्लासों पर लगाम लगेगी क्या... उल्टा प्रभाव यह होगा कि ग्यारहवीं और बारहवीं के इम्तहान के लिये भी बच्चे को टॉप की कोचिंग दिलाना और अच्छा रिजल्ट निकालने वाले स्कूल में येन-केन प्रकारेण भर्ती कराना माँ-बाप की मजबूरी हो जायेगी... दूरस्थ इलाकों के व साधनहीन सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे जिनके पास न काबिल शिक्षक हैं, न साधन, न बिजली, न अत्याधुनिक एजुकेशनल मैटीरियल... न तो कभी टॉप २०% में आ पायेंगे और न ही कभी IIT का सपना देख पायेंगे...

मुल्क के कुछ सबसे बेहतरीन दिमाग IIT's से जुड़े हैं... उनको यह भी पता है कि संस्थान के विद्मार्थी के भीतर सही में क्या काबलियत होनी चाहिये... यह लोग थोड़े से प्रयास से एक ऐसा इन्ट्रेन्स टेस्ट डिजायन कर सकते हैं जिसके लिये कोचिंग कोई भी कोचिंग क्लास न दे सके... जो तोतारटंतों की समझ में ही न आये... जो विद्मार्थी की समझ, चीजों को एनालाइज करने की क्षमता, तार्किकता व उस समझ के सही एप्लीकेशन की परख करता हो... इस टेस्ट के लिये तो १२ साल की स्कूली शिक्षा की कोई बाध्यता भी नहीं होनी चाहिये... जो भी समझे कि उसमें यह योग्यता है उसे यह टेस्ट देने का हक होना चाहिये... आखिर अपने काम की गणित, भौतिकी और रसायन तो संस्थान खुद पढ़ाता ही है बाद में...

पर अपेक्षा के अनुसार ही सरकार और कर्ताधर्ताओं ने ऐसा कुछ नहीं सोचा... और देश के एक बहुत बड़े साधनहीन युवा वर्ग के सपने छीन लिये एक झटके में... माँ-बापों को मजबूर कर दिया कि बच्चे के सपने अगर जिन्दा रखने हैं तो चाहे खुद को बेचो, पर उसे पढ़ाओ शिक्षा की दुकानों में ही... ग्यारहवीं और बारहवीं में भी ट्यूशन-कोचिंग कराओ...

डूब मरो सरकार... पर मुझे यह दूर से कुछ आहटें सी क्यों सुनाई दे रही हैं... यह मेरा भ्रम है क्या... या यह मूर्खतापूर्ण कदम वाकई आमूलचूल परिवर्तन की बुनियाद रखने जा रहा है... और हलचल शुरू हो गई है...








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6 टिप्‍पणियां:

  1. सरकार और कर्ताधर्ताओं ने ऐसा कुछ नहीं सोचा... और देश के एक बहुत बड़े साधनहीन युवा के सपने छीन लिये एक झटके में...

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  2. पढ़े लिखे अधिक समस्या करने लगे हैं आजकल, सुना है।

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  3. कानून की पढ़ाई करने वाला इंजीनियरिंग का स्लेबस बना रहा है.. उसे खाक तमीज़ होगी की इंजीनियरिंग क्या होती है..

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  4. .हम यु पी बोर्ड से थे और ये हालत थे की कोई ६० % पा जाये तो बड़ी बात मान ली जाती थी इस साल सी बी एस सी से पढ़ रही मेरी कजन ने ९५% नंबर पाये है ९.८ रेटिंग ( जी भी ) अब बोलिये है कोई मुकाबला | पता नहीं पढ़े लिखे विद्वान जन इस देश के बारे में ढंग से और जमीनी रूप से सोचना कब शुरू करेंगे और रही बात नीजि शिक्षा के क्षेत्र की तो बस हम हलाल होने के लिए तैयार हो रहे है बिटिया के बड़े होने के साथ |

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  5. प्रश्न यह है कि लागू करने वाला कौन है? समाजवाद के खोल के भीतर छुपा पूँजीपती ही न? इनसे आम भारतीयों का हित कभी संभव ही नहीं है। अभी क्यों.. ये तो शुरू से ही दोहरी शिक्षा देते चले आ रहे हैं। अब तो सारी हदें पार करने का इरादा है। इस सामयिक चिंतन के लिए आभार।

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  6. दो बार टिप्पणी करना विफल हुआ है -
    अब केवल यही कि हम ऐसी शिक्षा और ज्ञान के साथ किस और बढ़ रहे हैं ?

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