गुरुवार, 14 जून 2012

महज़ हंगामा खड़ा करना ही इनका मकसद नहीं, कोशिश तो यह भी है, कि, इनकी दूकानें चलती रहनी चाहिये....

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Black Money

noun

[mass noun]
income illegally obtained or not declared for tax purposes.

एक उदाहरण से बात शुरू करता हूँ, जिस कॉलोनी में फिलहाल बसेरा है अपना, वहाँ अपने एक पड़ोसी हैं शर्मा जी, किसी सरकारी बैंक में कैशियर, दो बरस पहले उन्होंने किसी देवता की जयन्ती के अवसर पर अपने स्वर्गीय माता-पिता की याद में अपने मकान के बाहर सार्वजनिक सड़क घेर कर एक धर्मस्थल तथा साथ ही उसके पुजारी के रहने के लिये भी एक कक्ष बना कर समाज को समर्पित कर दिया... भक्तगणों के बीच धर्म स्थल हिट हो गया और नतीजे के तौर पर साल में कई बार के भंडारे, जागरण, जन्मोत्सव आदि आदि के आयोजनों व उनकी चंदा उगाही के परिणाम स्वरूप धर्मस्थल के मुख्य सेवक शर्मा जी के पास भगवा झंडा लगी व नेम प्लेट पर सुनहरे अक्षरों में धर्मस्थल का नाम लिखी दो दो बोलेरो हैं... कोई भले ही इस सब को ईश्वरीय कृपा कहे पर हकीकत में यह है काला धन ही...

ठीक इसी तरह दहेज रोधी स्पष्ट कानून होते हुऐ भी दहेज के रूप में लिया-दिया धन व उपहार भी काला धन ही है... आपका सुनार, जनरल स्टोर वाला या कपड़ा विक्रेता जो कभी भी आपको पक्की रसीद नहीं देता... व साल के अंत में मात्र खानापूरी के लिये नाममात्र का टैक्स रिटर्न भरता है... उसका सारा धन भी काला ही है... कभी कभी तो आप पायेंगे कि चंद कानून का पालन करने वाले लोगों को छोड़ आप चारों ओर काले धन की अर्थव्यवस्था से घिरे हैं...

योगऋषि रामदेव जी के लिये यह दुनिया बहुत ही सरल सी है... जिस प्रकार मन या शरीर की किसी भी जटिल से जटिल व्याधि का 'अद्भुत लाभ' देने वाला इलाज उनके पास कपालभाती, अनुलोम विलोम व भस्त्रिका करने तथा त्रिफला, तुलसी, नीम, गिलोय व लौकी के जूस का सेवन करने में है... उसी तरह आज के भारत की हर समस्या का समाधान उनके पास विदेशों में जमा काला धन भारत लाने में है... उनकी माँग यह भी है कि काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित किया जाये... जबकि इस संबंध में कानून पहले से ही हैं और उन्हीं के आधार पर आयकर व ईडी के अधिकारी जब्ती की कारवाई करते हैं...

आज से तकरीबन दस बारह साल पहले योगऋषि निकले थे एक मिशन पर पूरे भारत को योगी और निरोग बनाने के... न तो कोई आंकड़ा ऐसा मिलता है कि देश के रोगियों में कुछ कमी आई है या दवाइयों की खपत कुछ कम हुई है... न ही ईर्द गिर्द बहुत से योगी दिखते हैं.... न ही योगऋषि का संस्थान कभी यह बताता है कि हरिद्वार स्थित संस्थान में योग व आयुर्वेद के जरिये कितनी असाध्य बीमारियों का इलाज खोजा जा चुका है, कितने रोगी ठीक हुऐ हैं और कितने आज इलाज करवा रहे हैं... परंतु आयुर्वेदिक दवाओं के साथ साथ स्वदेशी को बढ़ावा देने के नाम पर उनकी संस्था आज बहुत बड़े पैमाने पर आटा, मल्टी ग्रेन आटा, अनाज, मसाले, साबुन, शैम्पू, तेल, खाद्म तेल, फेस क्रीम, बॉडी लोशन, टूथ पेस्ट, फलों का रस, स्कवैश, जैम, मेवे,  बादाम पाक आदि आदि बेचने लगी है... पहले यह सब केवल पतंजलि सेवा केन्द्रों के जरिये बेचा जाता था.. अब खुले बाजार में भी इनकी बिक्री के विज्ञापन आने लगे हैं... यानी कुल मिलाकर FMCG  यानी फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स के कारोबार में हैं आज योगऋषि, वह भी लंबे चौड़े निवेश के साथ...

इसी पृष्ठ भूमि में जब योगऋषि मुद्दा उठाते हैं काले धन का या विदेशी निवेश व बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर निशाना साधते है तो दिमाग में कुछ खटकता है कि कहीं इसी बहाने अपने माल का अप्रत्यक्ष विज्ञापन तो नहीं किया जा रहा...

३ जून, २०११ की वह रात याद कीजिये, मीडिया के सौ से भी अधिक कैमरों के सामने दिल्ली पुलिस योगऋषि को गिरफ्तार करने की कोशिश करती है, वे भक्तों के बीच कूद जाते हैं, महिला भक्तों का अंतिम सुरक्षा घेरा अपने इर्द गिर्द बनाने की बात करते हैं... फिर स्त्रीवेश में खुद को छुपाये निकल जाने का प्रयास करते हैं... आज यह कल्पना कीजिये कि यदि उस दिन वह अपनी इस मंशा में कामयाब हो धरना स्थल से निकल किसी सहृदय भक्त के घर चार दिन के लिये छुप जाते तो क्या होता... कैसी अफवाहें उड़ती, क्या प्रतिक्रिया होती भीड़ की, अराजकता का कैसा साम्राज्य फैल जाता...

आज फिर कालेधन की आड़ में योगऋषि रामदेव का मुख्य हमला है मल्टीनेशनल कंपनियों, उनके उत्पादों व विदेशी निवेश पर... क्यों है ऐसा... इसे समझने के लिये आपको उनके समर्थकों को समझना होगा.... कौन है उनके साथ ?... उनके साथ हैं मझोले दर्जे के व्यापारी, उद्मोग घराने व उद्मोगपति... यह वह तबका है जो आर्थिक उदारीकरण से सबसे ज्यादा त्रस्त है,,, इसके पास पूंजी थी और उदारीकरण से पहले के लाइसेंस परमिट राज में यह तबका बिना कुछ खास किये पुरानी तकनीक, घटिया प्रोडक्ट व पैकेजिंग के बावजूद जमकर मुनाफा कमाता था... मल्टीनेशनल कंपनियाँ, उनका माल व उनका वर्क कल्चर इसी तबके को सबसे ज्यादा खलता है... इस तबके की समझ में यह नहीं आता कि जब हमारा पुराना मुनीम साइकिल से बंगले पर आ सुबह शाम दो बार सलाम बजाता था, केवल गुजारे भर की तनखा में काम करता था तो आज के प्रोफेशनल मैनेजरों को लाखों की तन्ख्वाहें, कारें व रहने के लिये महंगे मकान देने की जरूरत क्या है... कंपनियों को शेयर मार्केट मे् लिस्ट कर बाकियों को भी उनके मुनाफे में हिस्सेदार बनाने की जरूरत क्या है... कोई आश्चर्य नहीं कि स्वदेशी, देश सेवा व समाज सेवा के लंबे चौड़े आदर्शों का हवाला दे पतंजलि ट्रस्ट की फैक्टरियों मे् भी बहुत से कुशल युवाओं से मार्केट रेट से कम पगार पर काम करवाया जा रहा होगा....

ठीक इसी तरह लोकपाल बिल लोकसभा से पास हो चुका है और देरसबेर राज्यसभा से भी पास हो ही जायेगा... ऐसे में टीम अन्ना के पास अब कोई काम नहीं रह जाता... पर येन केन प्रकारेण चर्चा में बने रहने की हसरत रखने वाली यह टीम अब नये मुद्दे उठा रही है... सीएजी की एक लीक हुई ड्राफ्ट रिपोर्ट का हवाला दे कोयला घोटाले के बारे मे् जनजागरण किया जा रहा है... मांग की जा रही है कि प्रधान मंत्री समेत चौदह मंत्रियों के खिलाफ एसआइटी जाँच करे... इस टीम को अब किसी सरकारी जाँच एजेंसी पर भरोसा नहीं... 

संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ बयानबाजी में मर्यादा का उल्लंघन हो रहा है, प्रशांत भूषण प्रधानमंत्री को 'शिखंडी' कहते हैं तो किरण बेदी 'धृतराष्ट्र'... इन सारे आरोपों को लगाने से पहले विषय-विशेषज्ञों की भी राय नहीं ली गयी है... कोयले के अकूत भंडार दुनिया में कई जगह मौजूद हैं... पर आज की दुनिया के पास उसका सबसे बड़ा उपयोग है कोयले को जला बिजली पैदा करने में... दुनिया की तमाम अर्थव्यवस्थायें बिजली की एक निश्चित कीमत से ज्यादा नहीं दे सकती हैं... इसलिये कोयले के खनन में खनन की लागत, खनन क्षेत्र में पर्यावरणीय क्लियरेंस पाने में लगी लागत, क्षेत्र में आयी आबादी के विस्थापन-पुनर्स्थापन की लागत,सरकार की रायल्टी, खनन कार्य में लगे कर्मियों व उपकरणों का खर्चा व सबसे बढ़कर खनन क्षेत्र से उपयोगकर्ता तक कोयले को पहुंचाने में लगी परिवहन लागत का एक जटिल गणित है... इस सब कारणों से कई उर्जा कंपनियों को आज विदेश से कोयले का आयात करना ज्यादा सस्ता पड़ रहा है... खुद सीएजी विनोद राय फायनल रिपोर्ट का इंतजार करने को कह रहे हैं... ऐसे में कोयला खनन ब्लॉकों के आवंटन के नाम पर घोटाला-घोटाला चीख पूरे देश को गुमराह करने के पीछे का मकसद समझ नहीं आता...


बरबस कहना पड़ता है, मित्रों कि...




महज़ हंगामा खड़ा करना ही इनका मकसद नहीं, कोशिश तो यह भी है, कि, इनकी दूकानें चलती रहनी चाहिये....











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12 टिप्‍पणियां:

  1. चौथा अनुच्छेद धारदार रहा।

    कंपनियाँ इतना सज्जन कब से होने लगीं? ... ... उदारता ज़्यादा हो रही है :)

    धृतराष्ट्र जैसे शब्द से हमें भी आपत्ति है, मान हानि का दावा किया जाना कुछ खास ग़लत नहीं होगा...

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  2. नक्कारखाने में तूती की आवाज ! सुनने समझने के लिये तैयार है कौन?

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  3. यानु लब्बो लुआब ये कि जो भी लोग और जिन भी मुद्दों पर आवाज़ उठा रहे हैं वो अपनी दुकान चलाने के लिए ऐसा कर रहे हैं । चलिए मान भी लिया कि उनकी दुकान इससे चल निकलती है तो ...तो क्या अन्ना हज़ारे देश के सबसे बडे राजनीतिक पद पर होंगी , किरन बेदी ..को शायद दोबारा से दिल्ली पुलिस का कमिश्नर पद मिल जाए ...प्रशांत भूषण ..उन्हें भी कोई बडा वकीली ओहदा मिल जाए ...नहीं । तो फ़िर दुकान चला के क्या कितना तीर मारने वाले हैं ये लोग ।

    और हां मुझे बार बार कोफ़्त इसी बात से होती है कि जब लोग इन विषयों और घटनाक्रमों पर लिखते हैं तो वे मुद्दों से ज्यादा व्यक्तियों को तरज़ीह देने लगते हैं ..वैसे मुद्दे का भी क्या जब आप मान ही रहे हैं कि देर सवेर लोकपाल बिल भी पेश और पास हो ही जाएगा , सीएजी की रिपोर्ट भी अभी प्रतीक्षारत है . तो ऐसे में क्या किया जाए ...आइए कौन बनेगा राष्ट्रपति के नित नए एपिसोड देखें ।

    हो सकता है कि आपको लगे कि ....(जब आप कुतर्क कर रहे हों, अवैज्ञानिक या अतार्किक बातें कह रहे हों तो आपकी बातों से कोई भी अर्थ नहीं निकलेगा, यह निश्चित है!)...किंतु इसके बाद भी .....एक ही सार ...असहमत असहमत असहमत ...नज़रिए से भी और पोस्ट से भी ।

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      अजय कुमार झा जी,

      आपकी असहमति सर माथे पर... मैंने अपना नजरिया रख दिया और आपने अपना... :)

      मैं अक्सर ऐसे मामलों में कहता हूँ कि समय सबसे बड़ा निर्णायक होता है...




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  4. बहुत दिन बाद दिखे भी तो बस यही लेकर बैठ गए :(

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  5. भ्रष्टाचारी जनता, दूसरों के भ्रष्टाचार से गुस्से में है.... और दूसरों के भ्रष्टाचार को नष्ट करके छोड़ेगी....

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  6. आपकी इस बात को समय पर डालना सही है. अन्‍यथा कुछ तो इस तथ्‍य को ही सही मानते है कि रामदेव जी गलत कर रहे है खैर सोच अपनी अपनी...

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  7. Dil Hai Toh Saamne Aa, Yaha Aisa Koi Dikhta Nahi Hai Jispe Dil Ho.

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