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हमारे हिन्दुस्तान का गाँव-देहात का आदमी जिस एक चीज से शायद सबसे ज्यादा घबराता है वह है उसके नाम की आर०सी० का कटना... आर०सी० बोले तो रिकवरी चालान... किसी भी सरकारी देय या बैंक से लिये किसी कर्ज के मामले में एक आम हिन्दुस्तानी ने जरा सा डिफाल्ट किया नहीं कि तड़ से कटी आर०सी०... फिर क्या होगा... रेवेन्यू विभाग का कोई भी अधिकारी, एस०डी०एम०, तहसीलदार, नायब तहसीलदार, कानूनगो, लेखपाल या कई मामलों में तो इनके ड्राईवर भी एक या दो खाकी वर्दी वालों के साथ उसे उसके घर से उठा ले जायेंगे व उसे तहसील की हवालात में बंद कर देंगे... उसे छोड़ा तभी जाता है जब उसके घरवाले कुल देय का आधा-तिहाई जमा कर दें।
आज कुछ इसी तरह की बात हो रही है, निजी क्षेत्र की भारतीय विमान कंपनियाँ पिछले कुछ समय से घाटे में हैं... 'बेलआउट' की माँग कुछ इस तरह से की जा रही है मानो इन कंपनियों को जिन्दा रखने से गुरूतर कोई दायित्व सरकार का नहीं है... हमेशा की तरह हमारे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के हजारों-हजार करोड़ रूपयों के इन कंपनियों में एक्सपोजर का हवाला दिया जा रहा है... आइये देखते हैं कि हुआ क्या है...
पारदर्शिता के इस जमाने में कुछ अगर पूर्णत: अपारदर्शी है तो वह है हमारा कॉरपोरेट जगत... खास तौर पर हमारे कॉरपोरेट घराने... पीढ़ियों से यह घराने सरकारी यानी जनता के पैसे पर पलते आये हैं... इनके काम करने का तरीका सीधा-सादा है... महज चार-पाँच करोड़ की सीड कैपिटल से यह किसी भी नये बिजनेस वेन्चर के प्रमोटर-सर्वेसर्वा बन जाते हैं... एक आम हिन्दुस्तानी को भले ही महज पचास हजार के कर्ज के लिये हमारे बैंक जूते घिसवा दें... परंतु इन घरानों के नाम पर हमारे सरकारी बैंक बिना कुछ आगा-पीछा सोचे सैकड़ों करोड़ रूपये निवेश कर देते हैं... रातों रात एक बड़ी कंपनी खड़ी हो जाती है... फिर IPO ( इनीशियल पब्लिक आफरिंग) लाया जाता है, दूर-दराज बैठे निवेशक अपना पैसा लगाते हैं... और प्रमोटर ६०-७०% की हिस्सेदारी अपने पास रखे हुऐ उन शेयरों के मार्केट कैपिटलाइजेशन के आधार पर हजारों हजार करोड़ का मालिक बन बैठता है... कंपनी चली तो प्रमोटर के बल्ले-बल्ले... और नहीं चली तो सरकारी बैंकों के एनपीऐ की लंबी चौड़ी लिस्ट में एक नाम और जुड़ जाता है... प्रमोटर तब तक सैकड़ो करोड़ कमा-खपा-पचा होता है... फिर किसी नये बिजनेस में मौके तलाशे जाते हैं...
आज पूरी दुनिया की इकॉनामी में मंदी का दौर है... पर तीन-चार साल पहले जब अर्थव्यवस्था उछाल पर थी तो अतिशयोक्ति पूर्ण Future Projections का अंदाज लगाते हुऐ हमारी विमानन कंपनियों ने विमान निर्माता कंपनियों को बड़े-बड़े ऑर्डर दे दिये... इन आर्डरों के पीछे निहित स्वार्थ रहे... हवाई अड्डों में इतना महंगा निजी निवेश हो गया कि आज विमान कंपनियों को एअरपोर्ट के टैक्स देने में आफत आ रही है... कॉरपोरेट टॉप ब्रास को इन तमाम डील मेकिंग व काम के पदों पर बैठे लोगों को वाइन-डाइन कराने के मेहनत भरे (?) काम के लिये करोड़ों की तनख्वाहें दी गईं... एयरलाइन के पायलटों को इतने ज्यादा वेतन भत्ते दिये गये जिसके वे हकदार नहीं थे... जरा सोचिये, उदारीकरण के इस दौर में पायलट बनने के लिये केवल १०+२ पास होना ही तो जरूरी है... पिता के पास यदि पैसा हो तो बिना कोई प्रतियोगिता दिये आस्ट्रेलिया, सिंगापुर या अमेरिकी-लैटिन अमेरिकी फ्लाईंग स्कूलों से साल-छह महीने में पायलट बन कर तैयार हो जाते हैं... खर्चा भी हर हाल में डोनेशन मेडिकल कालेज से एम०बी०बी०एस० करवाने से कम ही होगा... वह दिन दूर नहीं जब हमारे महानगरों में कोई बड़ा पत्थर हिलाने पर उसके नीचे से दो-तीन पाइलट टहलते निकलेंगे... कुछ इसी तरह केबिन-क्रू को भी ग्लैमराइज व ओवर-पेड बना दिया गया... खास तौर से पायलट तो इतने अड़ियल हो गये हैं कि एयर इंडिया के पायलटों का एक धड़ा महज इसीलिये हड़ताल पर जाने की धमकी देता है क्योंकि वह नहीं चाहता कि दूसरे धड़े के पायलटों को बोईंग के नये प्लेन ' ड्रीमलाईनर' को चलाने का मौका मिले...
कुल मिलाकर पूरी तरह से आश्वस्त होते हुऐ कि यदि पैसा डूबेगा तो सरकारी ही (जो बेचारी जनता का ही है)... एक आर्थिक रूप से अक्षम मॉडल के आधार पर हमारे विमानन क्षेत्र के लिये सपने गढ़े गये... किराया जो तेल के खर्चे, एयरपोर्ट के खर्चे, विमान के लीज के किराये, स्टाफ की तन्खवाह व लोड फैक्टर आदि के आधार पर निर्धारित होना था... असामान्य रूप से घटा दिया गया, कई मामलों में तो हवाईजहाज का सफर ट्रेन के सफर से भी सस्ता कर दिया... इतना सस्ता किराया देख पब्लिक हवाई जहाजों की ओर दौड़ी... तो हवाई उड़ान भरने वालों की दिनोंदिन बढ़ती संख्या दिखाकर सार्वजनिक बैंकों को भविष्य में मोटे लाभ के सपने दिखा उनका और पैसा कंपनियों में फंसा दिया गया...
अब जब यह विमानन कंपनियाँ घाटे में डूब रही हैं तो गुहार लगाई जा रही है सरकार से 'बेलआउट' की... जबकि सरकार को इन सबकी आर०सी० काटनी चाहिये... बैंको ने यह जो एक्सपोजर लिया है इन कंपनियों में उसकी जमानत के तौर पर जो भी चल या अचल संपत्ति रखी गई थी वह भी जब्त हो... सरकारी पैसा 'प्रभु-वर्ग' को हवाई यात्रा करवाने के काम में तो हरगिज-हरगिज नहीं इस्तेमाल होना चाहिये...
क्या इन सब प्रमोटर-मालिकों भी आर०सी० कटेगी कभी ? लोकपाल के दायरे में आयेगा क्या कभी कॉरपोरेट भ्रष्टाचार ? सुन रहे हो क्या India Against Corruption ?
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sahi frmaya jnab ne .akhtar khan akela kota rajsthan
प्रत्युत्तर देंहटाएंकटनी तो चाहिये।
प्रत्युत्तर देंहटाएंआज तो सर से गुजर गया आपका लिखा। शायद अभी नहीं समझ पा रहा…वैसे आरसी का नाम मैं पहली बार सुन रहा हूँ…कम से कम बिहार में तो देहात में लोग नहीं घबड़ाते इससे, जहाँ तक मैं जानता हूँ
प्रत्युत्तर देंहटाएंआप जो चाहते हैं होगा तब जब सत्ता आम मेहनतकश लोगों की होगी। अभी तो कारपोरेट जगत के लोगों के ही सच्चे प्रतिनिधि जनता की छाती पर मूंग दल रहे हैं।
प्रत्युत्तर देंहटाएंअच्छा विवेचन किया है ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंYour comment box doesn't acccept my copy-pate.
प्रत्युत्तर देंहटाएंWhat should I do.
Please change this page setting or give your email ID.
Please see
http://aryabhojan.blogspot.com
द्विवेदी जी की बात बिलकुल सही है...
प्रत्युत्तर देंहटाएंबड़े लोग बड़े खेल! कल एक सज्जन ने मुझे एक लिंक दिया - http://bit.ly/tUNcAx
प्रत्युत्तर देंहटाएंविमान यात्राएँ इसलिए भी हो रही हैं कि रेल गाड़ियों के टिकट मिलना कठिन होता जा रहा है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंदिनेश जी, सत्ता जिसकी भी होगी भ्रष्टाचार भी उसका होगा.सत्ता भ्रष्ट करती है क्योंकि सत्ता शक्ति है और शक्ति भ्रष्ट करती है.सो सत्ता में किसी को भी लंबे समय नहीं रहना चाहिए.
जब खूब खूब लाभ हो रहा होता है तो कोई अपना लाभ जनता को बांटने नहीं आता तो हानि क्यों बांटी जाए? सो उनका घाटा उन्हें ही मुबारक.
घुघूतीबासूती
लोकपाल के दायरे में क्या कभी आएगा कार्पोरेट भ्रष्टाचार ?
प्रत्युत्तर देंहटाएंबेहतर...