मैं तो 'काले' को 'काला' ही कहूँगा और 'सफेद' को 'सफेद' भी, आप की मर्जी आप मुझे जो कुछ भी कहो . . .
बृहस्पतिवार, 10 जून 2010
शुक्रिया अदा करें नापसंदगी के चटकों को... और कितना गिरेंगे हमलोग ?
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मेरे 'नापसंदगी को नापसंद करने वाले' मित्रों,
आज बहुत गर्मागर्म बहसें हो रही हैं ब्लॉगवाणी द्वारा दिये गये नापसंदगी के चटके के उपयोग के बारे में...
तभी नजर पढ़ी आज इस समय ५.४५ सांय की कुछ सबसे ज्यादा पढ़ी गई पोस्टों पर...
पहली पोस्ट
तुम भी कभी जवान हुआ करती थी रचना !...
एक सफल मंचीय कवि की है, पोस्ट साफ-साफ द्विअर्थी है और स्पष्ट रूप से दुर्भावनापूर्ण है ।
इस पोस्ट को ब्लॉगवाणी से अभी तक ८० पाठक मिले हैं और १६ नापसंदगी के चटके इसे मिल चुके हैं।
दूसरी पोस्ट एक एकदम नये ब्लॉगर की है
तेरी माँ भी कभी जवान थी ओये कुंजड़े...
क्यों और किसके लिये लिखी गई है आप स्वयं दिमाग लगायें।
और इस पोस्ट को मिले हैं ८५ पाठक और ९ नापसंदगी के चटके ।
मैंने भी दोनों पोस्टों पर नापसंदगी का इजहार किया है ।
जो लोग ब्लॉगवाणी द्वारा दी गई नापसंदगी का चटका लगाने की सुविधा बंद करने की बात कर रहे हैं... वह बतायें कि मॉडरेशन लगा होने की स्थिति में ऐसी बेहूदा पोस्टों के प्रति अपनी नाराजगी (जो कि पाठक नापसंदगी के चटके लगा कर जाहिर कर रहे है) व्यक्त करने का कोई और तरीका है क्या आपकी नजर में ?
गर नहीं तो...
शुक्रिया अदा करें नापसंदगी के चटकों को... .
आभार!
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प्रस्तुतकर्ता
प्रवीण शाह
ने यह पोस्ट की
6:17 अपराह्न
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41 पाठकों ने टिप्पणी की,आप भी करिये न...:
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