मैं तो 'काले' को 'काला' ही कहूँगा और 'सफेद' को 'सफेद' भी, आप की मर्जी आप मुझे जो कुछ भी कहो . . .
बुधवार, 2 जून 2010
क्या पिद्दी और क्या पिद्दी का शोरबा... अमेरिका का बगलबच्चा यह देश जानबूझकर यह दुस्साहस कर रहा है...पर स्वाभिमानी भारतीय क्यों चुप रहें ???
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मेरे स्वाभिमानी मित्रों,
मेरा मानना है कि अगर आप खुद अपनी इज्जत नहीं करते हो तो दुनिया से यह उम्मीद करना बेमानी है कि वो आपको इज्जत बख्शेगी ।
इसीलिये विरोध स्वरूप यह आलेख लिख रहा हूँ क्योंकि मुझे कहीं से भी कोई विरोध होता नजर नहीं आ रहा अमेरिका के इस बगलबच्चे देश कनाडा का !
सबसे पहले छत्तीसगढ़ से प्रकाशित 'इस्पात टाइम्स' में पुष्पेश पंत का लिखा ३१ मई का यह आलेख...
कनाडा ने ऐसा दुस्साहस क्यों किया?
पढ़ें, यही आलेख आप 'अमर उजाला' के ३१ मई के सम्पादकीय पृष्ठ पर भी देख सकते हैं परंतु बहुत ढूंढने पर भी मुझे कोई कामयाब लिंक नहीं मिल पाया ।
मेरा तो खून खौल गया पढ़कर, अब मैं भी पुष्पेश पंत जी के सवालों को ही एक बार दोहरा दे रहा हूँ...
"जहां तक भारत का सवाल है, तो पिछले कई वर्षों से कनाडा का भारत के प्रति आचरण लगभग दुश्मनी वाला रहा है। वे दिन गए, जब कनाडा के खुशमिजाज प्रधानमंत्री पियेर त्रूदो नेहरू के प्रशंसक हुआ करते थे। यह ठीक है कि कनाडा ने भारत के शांतिपूर्ण परमाणविक ऊर्जा कार्यक्रम को पहले सहायता दी थी। पर हाल के वर्षों में हमारी परमाणविक महत्वाकांक्षा की राह में कनाडा अड़चनें ही पैदा करता रहा है। ऑस्ट्रेलिया हो या कनाडा, वे ये सब हरकतें अमेरिका के इशारे पर ही करते हैं। इस भरम को भी देर तक पाले रहने की जरूरत नहीं कि राष्ट्रकुल की सदस्यता की वजह से यह रिश्ता कोई अहमियत रखता है। कनाडा वासी महारानी एलिजाबेथ को पूजते रहें, भारतीय गणतंत्र की ऐसी मजबूरी नहीं। कबूतरबाजी के शिकार पंजाबियों या मध्यवर्गीय शहरी हिंदुस्तानियों के लिए कनाडा स्वर्ग हो सकता है, पर स्वाभिमानी भारतीय के लिए यह वक्त चुप रहने का नहीं। विदेश मंत्रालय को साफ करना चाहिए कि हमारे लिए कनाडा किस दृष्टि से इतना महत्वपूर्ण है कि हम खून का घूंट पीकर लगातार ये ठोकरें बर्दाश्त कर रहे हैं।"
आप ही बताओ...
क्या है भारतीय गणतंत्र की मजबूरी ?
क्यों चुप रहें स्वाभिमानी भारतीय ?
साफ करे हमारा विदेश मंत्रालय कि क्यों हम खून
का घूंट पीकर लगातार ये ठोकरें बर्दाश्त कर रहे हैं ?
है कोई जवाब इसका किसी के पास ?
मेरी भावना से इत्तेफाक रखते हों तो जो भी मौका या मंच आपको मिले, विरोध दर्ज करवायें !.
आभार!
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21 पाठकों ने टिप्पणी की,आप भी करिये न...:
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have a patience
प्रत्युत्तर देंहटाएंस्वाभिमानी भारतीय??? हा हा हा हा हा हा हा हा हा
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रवीण भाई क्या मजाक करते हैं आप भी…
जिस देश के जवानों को बांग्लादेश के सूअर जब चाहे मारते रहते हैं, उनकी लाशें उल्टा लटकाकर भेजते हैं, वहाँ स्वाभिमान की बातें? वो कनाडा भी के मामले में… जिससे परमाणु भीख लेनी है भविष्य में…
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प्रत्युत्तर देंहटाएं.
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@ mrityunjay kumar rai,
What 'Patience' ???
This particular country is deliberately offending & belittling us... And you are preaching 'PATIENCE' ?
जिस देश में सरकार से किये गए हर सवाल का जवाब; "हम इस साल ९-१०% से ग्रो करेंगे" है, उस देश में इस तरह के प्रश्न बेमानी हैं. मीडिया की बोलती बंद कर देने वाली सरकार ने किसी भी प्रश्न का जवाब न देकर जनता की बोलती बंद करने का काम शुरू किया है. कहाँ विरोध दर्ज करवाएं? किससे विरोध दर्ज करवाएं?
प्रत्युत्तर देंहटाएंहमारे भाग्यविधाता विदेश नीति कैसे चलाते हैं इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि उन्हें पता ही नहीं कि कनाडा की सरकार उन जवानों को या उन अफसरों को वीजा ही नहीं देती जिन्होंने कभी कश्मीर में ड्यूटी की है. क्या करते हैं विदेश मंत्रालय में काम करने वाले हमारे अफसर और मंत्री? घास छीलते हैं ये लोग? या केवल ट्वीट करना जानते हैं? हमारी विदेश नीति पकिस्तान सेंट्रिक होने के बावजूद हम आये दिन पकिस्तान तक से कूटनीति में हारते रहते हैं.
विरोध? माय फुट.
क्रोध पर नियंत्रण स्वभाविक व्यवहार से ही संभव है जो साधना से कम नहीं है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंआइये क्रोध को शांत करने का उपाय अपनायें !
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@ आचार्य जी,
देव! कही और मौके तलाशिये... यह बंदा किसी को गुरू या व्यवहार-नियंत्रण-ट्रेनर नहीं बनाना चाहता.... :)
आदरणीय :
प्रत्युत्तर देंहटाएं:
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प्रवीण शाह जी ,
पहले तो यह कहूंगा कि श्री पन्त जी को जहाँ तक मैंने पढ़ा है, वे एक समय विचारधारा के समर्थक है, और देखा जाए तो कनाडा ने हमें हमारी औकात बताई, इससे ज्यादा कुछ नहीं किया ! हिम्मत थी तो जिन सनिन्य अधिकारियों को वीजा देने से इनकार किया गया उनका पक्ष उसी समय कठोरता से रखकर दिखाते पिछले दिसम्बर से अब तक क्यों चुप बैठे रहे ?
समय को साम्य पढ़े
प्रत्युत्तर देंहटाएं@ प्रवीण शाह
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रवीण जी शास्त्रों में कहा गया है , दोस्ती और दुश्मनी बराबर वाले से की जाती है , क्या हम कनाडा के बराबर है . कभी नहीं ! कनाडा एक शांत मुल्क है , जिसके साथ अमेरिका लगा हुआ है . कनाडा का रक्षा बजट भारत से काफी कम है , पड़ेसी मुल्क दुसमन नहीं है .
और भारत चारो और से दुष्ट राष्ट्रों से घिरा हुआ है , पाकिस्तान , बंगलादेश , नेपाल , वर्मा , चीन .
हमारी औकात नहीं है की हम कनाडा और अमेरिका को नाराज कर सके . आपके पास सब्र करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है
अपने गुस्से को पालना सीखिए , और गुस्से को ताकत बनाइये न की कमजोरी , अपनी क्षमता बढ़ाकर फिर कनाडा का मुकाबला करे, ऐसे हवाबाजी से कुछ फायदा नहीं होने वाला
hum sirf dhamkiyan de sakte hain
प्रत्युत्तर देंहटाएंaur doosare kuchh bhi kar sakte hain
प्रवीण भाई, आप कहेंगे कि मैं राजनीति कर रहा हूं, लेकिन चूंकि आपने "स्वाभिमानी भारतीय" का प्रश्न उठाया है इसलिये स्वाभाविक रुप से पूछने की इच्छा होती है कि क्या पिछले 60 साल में हमारी सरकारों (बल्कि एक परिवार की सरकारों) ने शिक्षा पद्धति में कोई आमूलचूल परिवर्तन किया है कि बच्चे बचपन से ही देशप्रेमी बनें, स्वाभिमानी बनें?
प्रत्युत्तर देंहटाएंफ़िर आप कैसे अपेक्षा करते हैं कि नागरिक स्वाभिमानी बनेंगे?
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प्रत्युत्तर देंहटाएं.
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"क्या पिछले 60 साल में हमारी सरकारों (बल्कि एक परिवार की सरकारों) ने शिक्षा पद्धति में कोई आमूलचूल परिवर्तन किया है कि बच्चे बचपन से ही देशप्रेमी बनें, स्वाभिमानी बनें?"
आदरणीय सुरेश चिपलूनकर जी,
इन पिछले ६० सालों में तकरीबन १० साल मौके दूसरों को भी मिले थे... मुझे लगता है कि 'स्वाभिमान', 'देशप्रेम' और 'चरित्र' ऐसी चीजें हैं जिनको कोई शिक्षा पद्धति सिखा नहीं सकती... यह सब आप अपने बड़ों के दिखाये उदाहरण से सोते-जागते उठते-बैठते हर पल सीखते हैं...और इसी लिये मैं इसे एक पूरी जेनरेशन (हम-आप वाली) की विफलता के रूप में देखता हूँ... यह पीढ़ी सिद्धान्तों को छोड़कर 'तथाकथित सफलता' के पीछे-पीछे भागते हुऐ अपना बहुत कुछ शायद हमेशा-हमेशा के लिये गंवा बैठी है।
आभार!
आदरणीय प्रवीण भाई,
प्रत्युत्तर देंहटाएं1) 60 साल बड़े कि 10 साल? अधिक दोषी कौन? जिसने ऐसी संस्कृति फ़ैलाई या जिसने रोकने के प्रयास नहीं किये?
2) पीढ़ी की विफ़लता का क्या अर्थ है? पीढ़ी विफ़ल इसीलिये हुई ना, क्योंकि उसे सही शिक्षा और संस्कार नहीं मिले?
जब नागरिकों में ही देश के प्रति स्वाभिमान नहीं है, तो सरकारों में कहाँ से आयेगा?
जो सरकारें अपने घर में घुसे नक्सलवादियों का क्या किया जाए इसका फैसला 40 सालों में नहीं कर पाये . उससे कोई उम्मीद रखना ज्यादती है
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रवीण जी इस लेख को पढवाने के लिए शुक्रिया
प्रत्युत्तर देंहटाएंhttp://ispattimes.com/article.jsp;jsessionid=0CB5F0B06C1B7F78A4B1BBF0FFBD7C84?article_id=12218
कूटनीति में हमारा देश तो वैसे भी कहीं नहीं टिकता.
बहरहाल आपने पूछा "स्वाभिमानी भारतीय"..? आज जो अधिकाँश समस्या है इसी की कमी के वजह से है.
दोष लचर शिक्षा व्यवस्था, अकुशल आर्थिक और विदेश नीति का भी है.
जो सेकुलर सरकार खुद सेना की एक पूरी बटालियन पर केश दर्ज कर आतंकवागदियों का हौसला बढ़ा रही है व विदेशों में हमारी मानबता से परिपूर्ण सेना की छवि खराब कर रही है फिर हम औरों से क्या उमीद करें?
प्रत्युत्तर देंहटाएंइन हालात के लिए कनाडा जैसे देशों से कहीं अधिक सेकुलर गद्दार जिम्मेवार हैं जो लगातार हमारे सुरक्षावलों को बदनाम करने के लिए पिछले कई वर्षों से अभियान चलाए हुए हैं
कल आपकी रचना चर्चा मंच पर होगी कृप्या देखें.
प्रत्युत्तर देंहटाएंआभार
अनामिका
प्रवीण शाह और सुरेश जी आप दोनों मुद्दे को भटका रहे है , आप दोनों किसी ना किसी राजनितीक विचारधारा से संबध लगते हो.
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रवीण जी शास्त्रों में कहा गया है , दोस्ती और दुश्मनी बराबर वाले से की जाती है , क्या हम कनाडा के बराबर है . कभी नहीं ! कनाडा एक शांत मुल्क है , जिसके साथ अमेरिका लगा हुआ है . कनाडा का रक्षा बजट भारत से काफी कम है , पड़ेसी मुल्क दुसमन नहीं है .
और भारत चारो और से दुष्ट राष्ट्रों से घिरा हुआ है , पाकिस्तान , बंगलादेश , नेपाल , वर्मा , चीन .
हमारी औकात नहीं है की हम कनाडा और अमेरिका को नाराज कर सके . आपके पास सब्र करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है
अपने गुस्से को पालना सीखिए , और गुस्से को ताकत बनाइये न की कमजोरी , अपनी क्षमता बढ़ाकर फिर कनाडा का मुकाबला करे, ऐसे हवाबाजी से कुछ फायदा नहीं होने वाला
एक रेहन पर रखे देश में स्वाभिमान...?
प्रत्युत्तर देंहटाएंआप सही कह रहे हैं...
ऐसी ही ललकारें शायद गिरेबां में झांकने का मौका दें...
वगरना हम विचारों की बजाए, व्यक्तियों में...
और नीतियों की जगह, संस्थाओं और पार्टियों में ही...
उलझे रहने को अभिशप्त हैं...
मैं वैसे तो अब प्रतिक्रिया देने से यथासंभव बचता हूँ, पर आपने प्रासंगिक सवाल किया है. क्या मैं इसके बारे में आपसे ईमेल पर कुछ विमर्श करूँ? क्या है की मेरा दृष्टिकोण पोलिटिकली करेक्ट नहीं है, इससे भावनाएं आहात हो सकती हैं.
प्रत्युत्तर देंहटाएंlimestone0km@yahoo.com
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प्रत्युत्तर देंहटाएं.
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@ ab inconvinienti,
मित्र असहज,
चाहे कितना ही पोलिटिकली इनकरेक्ट हो, कहो यहीं पर्दे के सामने... पर्दे के पीछे कोई विमर्श मेरे उसूलों के खिलाफ है।
आशा है अन्यथा न लोगे, ब्लॉग पर आने के लिये आभार!
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