बृहस्पतिवार, 9 मई 2013

चला जाये क्या ?

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हमने अबतक
बहुत अपनी
बकवास की

मन भर के 
हर किसी से
झगड़  लिये

जो कहना था
किसी को भी
कह चुके

बेलाग बेखौफ
सुनाना था जो
सुना दिया

सुनाने वाले
सबकी हमने
दिल से सुनी

कहीं किसी को
फर्क तो कोई
पड़ता नहीं

दुनिया वही
पहले जैसी
चलती रही

अपनी बकबक
अब खुद ही को
चुभने लगी

कुछ रूककर
सुस्ताकर भी
देख लिया

इस डेरे में 
पहले सा मजा
आता नहीं

कई दूर ठिकाने
अन्देखे अन्जाने
बुला रहे

तामजाम अपना
फैलाया नहीं था
हमने कभी

समेटने में उसे
वक्त लगेगा
बिल्कुल नहीं

अब...
चला जाये क्या ?











...