शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

झंडा फहराने जाते समय रास्ते के चौराहे पर ।

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आज पंद्रह अगस्त है
सुबह सुबह निकला हूँ
अपने ऑफिस की ओर
झन्डा जो फहराना है
मुल्क की आजादी का
उत्सव एक मनाना है

और मुझे दिखता है
शहर का वह चौराहा
जहाँ पर अल्ल सुबह
फहरा के चला गया है
हमारा राष्ट्र ध्वज कोई
इसकी गवाही दे रहे हैं
बिखरी गुलाब की पंखुडियां
सड़क पर पड़ा ढेर सा चूना
और लहराता हुआ तिरंगा भी

और अब उसी चौराहे पर
खैनी मलते-बीड़ी फूंकते
उकड़ू बैठे बतियाते हुए
बैठे हैं अनेकों मेहनतकश
अपनी कन्नी, फंटी, आरी
गेंती, कुदाल, फावड़े,रस्सियाँ
पेंट के ब्रश, घास की कूंचियाँ
न जाने कितने तो औजार लिये
मेहनत का एक बाजार सजाये

वे देखते है आस भरी नजरों से
हर आने और जाने वाले को
जो केवल आज भर की दिहाड़ी दे
खरीद ले उनकी आज की मेहनत
उनके लिए नहीं आज कोई उत्सव
आज भी है एक आग लगी पेट में
अपनी मेहनत बेच पाई कमाई से
जिसे शाम को थोड़ा बुझा पाएंगे वे

गिनता हूँ मैं अपने मन ही मन
अड़सठवां पन्द्रह अगस्त है यह
पर वह वाला आखिर कब आएगा
जिस दिन मेरे धर्मभीरु देश में
मेहनत का देवता 'मेहनतकश' भी
पेट की आग की फ़िक्र किये बगैर
मेरे, तुम्हारे, हम सबके संग संग
आजादी का यह त्यौहार मनायेगा।

सोचो, दोस्त... आखिर कब ?





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