शनिवार, 14 मार्च 2015

मेरी तीन अलक ।

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ब्लॉग पर लिखना हो नहीं पाता आजकल, इसलिये फेसबुक की कुछ खुराफातें ब्लॉग पर... क्या किया जाये मित्रों, आखिर ब्लॉग को जिन्दा भी जो रखना है... :)




१-

लप्रेक पढ़ीं होंगी आपने, आज पढ़िये 'अलक' (अति लघु कथा)

गाँव का स्टेशन... चाय की दुकान पर बारह साल का लड़का... "ऐ, जरा वो देना" ग्यारह साल की लड़की... "ऐ नहीं, किशना हूँ मैं"... लड़की को अंदाज़ पसंद आया... वो रोज दुकान पर आने लगी... चार साल बीत गये... बात फैल गयी... "नसीमा, मेरा तेरा मेल संभव नहीं" कहा किशना ने... वो रेल के नीचे कटने भागी... बमुश्किल बचाया किशना ने... उस दिन के बाद वह लड़की की जिद और जूनून से डरने लगा... नसीमा को पीटा बाप-भाई ने... वो आधी रात को किशना के घर भाग आई... नसीमा की जिद पर उसी रात दोनों घर में रखे सारे पैसे लेकर भाग गये... पंद्रह दिन में पैसे ख़त्म... दोनों अपने अपने घर वापस... "तुम चाहे मेरी बोटी बोटी काट डालो, पर मैं मजिस्ट्रेट के सामने यह नहीं कहूँगी कि किशना मुझे बहला-फुसला ले गया और उसने मेरे साथ गन्दा काम किया" अड़ गयी नसीमा... उसी रात सोती नसीमा का भेजा गोली मार उड़ा दिया उसी के भाई ने... इल्जाम लगाया गया किशना पर... किशना बंद है आजकल... उसकी जान सलामत रहे, इसलिये घर वाले जमानत नहीं कराते... दुनिया कहती है कि 'प्यार' अभी भी जिन्दा है और फल-फूल रहा है।

(अख़बार की एक ख़बर से प्रेरित)

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२-

अलक (अति लघु कथा)- २

मेहनतकश की सेक्सी बीबी

भीम ने आखिरी टाइल काटी, करीने से जमाई, काफी देर तक फिनिशिंग चेक की, फिर बोला "लो साहब, काम हो गया आपका।"... मालिक नेक था "बहुत अच्छा काम है तुम्हारा, नंबर दे जाओ और यह लो ईनाम के 1000 रूपये ।"...उसका मन तो किया कि ईनाम के लिये मना कर दे, पर फिर खाली जेब और उस ख्याल ने उसे रोक दिया।... वह तेजी से साइकिल चलाते उसी दुकान की ओर गया, जिसके शोकेस में लगी थी वो झीनी मेरुन नाइटी... जब से उसने फिल्म में हीरोइन को वह नाइटी पहने देखा है, उसका मन है कि सुषमा को भी खरीद कर दे वैसी ही नाइटी... रंग रूप में कोई किसी हीरोइन से कम नहीं है उसकी सुषमा, कितनी सेक्सी लगेगी उस नाइटी में, और फिर आज तो उनकी शादी की सालगिरह भी है...

दुकान तक पहुँचा ही था कि फोन बजा... "बेटा,तीन चार दिन से सिर में हर समय दर्द हो रहा था और आज तो चक्कर भी आने लगे हैं" माँ बता रही थी... माँ को भी अपनी बीपी की दवाई ख़त्म होने की याद अभी ही दिलानी थी, वह झुंझलाया...

दरवाजा बजते ही सुषमा, माँ और दोनों बच्चे भागकर आये... उसने मुस्कुराते हुए डिब्बा सुषमा को दिया "लड्डू हैं, मंदिर में भोग लगा सबको बाँट दो, सालगिरह है हमारी आज !"... फिर माँ की ओर मुख़ातिब हो बोला "यह लो माँ, पूरे दो महीने की दवाई है ।"

सही भी है, अपनी इस दुनिया में किसी मेहनतकश को ख्वाब देखने का क्या हक़ है ?
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३-


अलक -3

शनि की दशा

महीने का आखरी हफ़्ता भारी होता था उन दिनों... और शनिवार होने की वजह से मेस भी बंद थी उस दिन... खाना बाहर ही खाना होगा... टहलता हुआ सिविल लाइन्स पहुँचा... जेब टटोली तो पाया,मात्र तेरह रूपये की रेजगारी ही है जेब में...कोई बात नहीं, आज रात केवल एक कॉफ़ी से ही गुजारा करना होगा... तीन रूपये की एक सिगरेट ली और सड़क किनारे के उस जॉइंट पर एक कॉफ़ी आर्डर कर बैठा ही था मैं कि उसने मुझे परेशान करना शुरु कर दिया... एक लोहे के टिन में लोहे के तार का हैंडल था, सरसों का तेल भरा था और अंदर पड़े थे ढेर सारे सिक्के... "जा यार, आज पैसे नहीं हैं।" भरसक मुस्कुराता बोला मैं... "कुछ तो दीजिये बाबू, सर से शनि उतरेगा आपके" उसने जोर दिया... मैंने अपनी सिगरेट पर ध्यान दिया... पर वह पास ही जमा रहा... मैंने एक बार फिर उसे जाने को कहा... "बिना कुछ लिये नहीं जाऊँगा, बाबू!" वो अड़ गया... "अच्छा यह बता कि तेरे सर से शनि की दशा कैसे उतरती है ?" गुस्से में था मैं अब... वह ढीठ बना दाँत दिखाते खड़ा रहा... अचानक मैंने निर्णय लिया, कमीज की बाजू मोड़ी और उस तेल के टिन में हाथ डाल एक मुट्ठी सिक्के निकाल लिये... काउंटर से पेपर नैपकिन लिया, हाथ पोंछे, सिक्के गिने, पूरे बीस रूपये थे... "जा, अब तो जा, अब तो तेरी शनि की दशा भी उतार दी मैंने !" मैं सख्ती से बोला उसे... हतप्रभ सा खड़ा था वह, यह सुनते ही उसने दौड़ लगा दी...

"एक वेज रोल भी लगाना मेरे लिये, कॉफ़ी के साथ।" चिल्लाया मैं... मेरे सिर से शनि सचमुच उतर चुका था ।


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