मंगलवार, 10 जून 2014

चरणामृत

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बात बहुत पहले की है, मैं छुट्टियों में घर गया था... सुबह सुबह एक पड़ोसन घर आई और न्योता दिया एक आयोजन का, बोली " पंजाब से हमारे गुरु जी आने वाले हैं "... हम सब भाइयों और बहन के अनिच्छा जताने पर भी माँ ने बहन की ड्यूटी लगा दी उस फंक्शन को अटेंड करने की और मेरी ड्यूटी लग गयी अपने से साढ़े छह साल छोटी बहन को ले जाने-लाने की...

भव्य आयोजन था, बड़ा सा पंडाल, बैठने और भोजन पानी का अच्छा इंतजाम... कुछ देर इंतज़ार के बाद एक लक्ज़री गाड़ी में श्वेत वस्त्र धारण किये हुए गुरु जी पधारे, साथ में उनकी पत्नी और पुत्र भी... उनके सिंहासन नुमा आसन पर बैठते ही गृहस्वामी और स्वामिनी ने उनके चमकते सफ़ेद जूते उतारे और एक चाँदी के तसलेनुमा पात्र में उनके चरण धोये... फिर उस पात्र के जल में कुछ बताशे आदि मिला उसे 'चरणामृत' रूप में वितरित किया जाने लगा...

पहले उस ओर का नंबर आया जिधर औरतें और लडकियाँ बैठीं थी... मैं गौर से लगातार उस ओर ही देख रहा था... मुझे उत्सुकता थी कि 'मेरी बहन' क्या करती है ... और वह मेरी बहन थी जिसने अपना हाथ आगे ही नहीं बढ़ाया... बगल खड़ी एक महिला ने जबरदस्ती उसका हाथ आगे खींच उसमें वह चरणामृत डलवा दिया... बहन ने हाथ पीछे की ओर कर उसे बह जाने दिया... यह देख आस पास खड़ी कुछ औरतें हमलावर होने लगीं... और कुछ दूर खड़ा मैं बहुत जोर से बोल पड़ा ताकि सब सुन लें "उसने बिल्कुल ठीक किया, गुरु ही तो हैं, भगवान नहीं, और मैं भगवान का भी इस तरह बनाया चरणामृत नहीं पीता"... सब चुप, मैंने बहन के गले में हाथ डाला और घर चला आया...

बाद में पता चला कि उसके बाद बहुतों ने चरणामृत नहीं पिया ... उस पड़ोसी का परिवार आज भी हम लोगों के साथ सहज नहीं है, पर मुझे इसका मलाल नहीं क्योंकि हमें ज़िन्दगी में कुछ मौकों पर फैसला तो करना ही होता है, वह उस दिन बहन ने किया और मैंने उसका साथ दिया ...






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