इतवारी फेसबुक चिन्तन:-

किसी के प्रति (यहाँ स्त्री-पुरुष, स्त्री-स्त्री व पुरुष-पुरुष के प्रेम की बात कर रहा हूँ मैं)# अपने प्रेम को अभिव्यक्त करने के तरीकों में 'सार्वजनिक चुम्बन' की गिनती कुछ निश्चित रूप से फूहड़ तरीकों में आती है ।

सहमत या असहमत ? कारण भी देंगे तो अच्छा लगेगा ... 

...

# बाद में भ्रम की स्थिति को स्पष्ट करने हेतु जोड़ा गया।

मनबोध मास्टर सार्वजानिक चुम्बन की सुघड़ता - फूहड़ता , स्थान विशेष में सामाजिक स्वीकार्यता पर निर्भर है . हमारे देश में तो फूहड़ता ही है . खुले में इत्ता जर्म्स होता है , स्वच्छता अभियान के बाद परिश्थितियां बदलेंगी . 
Unlike1DeleteSunday at 10:41am

Ashish Shrivastava ना जी, सड़क के किनारे सार्वजनिक रूप से हगना मूतना हमारी सभ्यता है।
Unlike4DeleteSunday at 10:49am

प्रवीण 'सुनिये मेरी भी' Ashish Shrivastava जी, सार्वजनिक रूप से मल-मूत्र विसर्जन भी फूहड़ है, निर्विवाद रूप से, और ऐसा मजबूरी में करता इन्सान भरसक अपने को दूसरों की नजर से छिपाने का यत्न तो करता ही है, चाहे कामयाब न हो पाये... 
Like1MoreSunday at 10:53am

Unlike1DeleteSunday at 10:55am

Ashish Shrivastava भारतीय सभ्यता और संस्कृति के प्रतिक मंदीरो और साहित्य को देखने/पढ़ने बाद असहमति का कोई कारण तो मुझे दिखायी नही देता।
Unlike2DeleteSunday at 10:59am

राजन सिँह आशीष जी आप कबसे भारतीय संस्कृति के उपासक हो गये?
उसके नाम पर तो और भी बहुत कुछ होता था.
Unlike1DeleteSunday at 11:07am

Ashish Shrivastava राजन सिँह सर आपको कब से गलतफहमी हो गयी कि मै भारतीय संस्कृति/सभ्यता का विरोधी हुं ?
Unlike1DeleteSunday at 11:25am

राजन सिँह अच्छा ?
तब तो आप जानते होंगें कि कई कमियों के बावजूद भारतीय संस्कृति जड नहीं रही।उसमें परिवर्तन होता रहा।बाल विवाह से लेकर बहुविवाह तक बहुत कुछ भारतीय संस्कृति के नाम पर होता रहा।
Unlike1DeleteSunday at 11:31am

Ashish Shrivastava भारतीय संस्कृति जड नहीं रही! हम्म.... तो अभी भी संस्कृति के नाम से लड़कीयो द्वारा जींस/मोबाईल के प्रयोग या जाती बाह्य विवाह का विरोध करने वाले लोग तो आयातित ही होंगे...
खैर हम तो आज भी भगौरीया जैसी प्रथा के दर्शक और कट्टर समर्थक रहे है...
Unlike1DeleteSunday at 11:35am

राजन सिँह खैर वो तो मानते ही हैं पर लगता है आप भी इन्हीं को भारतीय संस्कृति का ठेकेदार मानते हैं।
आपको पता होगा कि मध्यकाल से पूर्व भारतीय समाज और संस्कृति आज की तुलना में ज्यादा खुले थे।
हम इन्हें रोकने की बात नहीं कर रहे।पर तरीका तो फूहड है ही।
Unlike1DeleteSunday at 11:41am

Ashish Shrivastava ये फूहड़ क्या होता है? ये सब करने की नौबत क्यो आयी, उस पर क्या? सार्वजनिक प्रेम प्रदर्शन के विरोधीयों ने कभी सरे राह चलती पूरे कपड़े पहनी लड़कीयो पर की जाने वाली फब्तीयों, छींटा्कसी का विरोध किया ? कालेजो के सामने की टपरीयो से होती छेड़छाड़ का विरोध किया ? टायलेट मे लिखे चित्रो, उक्तियों का विरोध किया? ये ठेकेदार कहाँ जाते है उस समय ?
Unlike2DeleteSunday at 11:45am

अमित शर्मा किसी को क्या तक्लूफ़ हैं, कोई सार्वजनिक चुम्बन ले, नख-क्षत, दन्त-क्षत, आलिंगन, रति-क्रिया करें।
Unlike2DeleteSunday at 11:48am

Tarun Verma सहमत
Unlike1DeleteSunday at 11:58am

Tarun Verma किस ऑफ़ लव के वालंटियर्स ने अपने माता पिता के द्वारा बनाई सभी इमारतें तोड़ दी हैं , उनका कहना है की ये उनकी निजी स्वतंत्रता का उल्लंघन है , और इसमें संघ का हाथ है , परन्तु वे सब अब यह बर्दाश्त नहीं करेंगे , अब वह अपने प्यार की अभिव्यक्ति सार्वजनिक रूप से सुहागरात सडको पर मना कर करेंगे ।
उनका अपने पक्ष में यह तर्क है की जब जानवरों को कही भी कुछ भी करने की आजादी है तो फिर हम तो इंसान हैं जो । अब हम भी कहीं भी हगेंगे , मूतेंगे , चुम्मा चाटी करेंगे ।
Unlike3DeleteSunday at 12:01pm

राजन सिँह इनके कृत्य को फूहड बताने का अर्थ उनको समर्थन देना कैसे हो गया?और आपको जरुर लगता होगा कि चुंबन पर्दर्शन में शामिल लडकों में से कभी किसीने छेडछाड न की होगी न टॉयलेट में गंदे चित्र बनाएं होंगें।और ये लोग जरुर अपनी माताओं और बहनों को भी वैसी ही स्वतंत्रता देने के पक्ष में होंगें पर हम इतने भोले नहीं 
Unlike4DeleteSunday at 12:01pm

हंसराज सुज्ञ यह फूहड़ता के साथ साथ जड़भरत सा बौड़म रवैया है।शिष्टाचार को अगर संस्कृति कह दिया तो ले अब नंगा होकर नाचूंगा!!
Unlike2DeleteSunday at 12:36pm

DeepChand Pandey मैं सहमत नहीं हूँ। मैं तो जब भी अपनी बेटी को उसके स्कूल के गेट पर छोड़ता हूँ तो बहुत प्यार से उसका एक चुम्बन लेता हूँ। ये सब सार्वजनिक रूप से होता है। अनेकों अभिवावकों के समक्ष ये होता है पर आज तक किसी ने मुझे कुछ नहीं कहा। सच्चाई यह है कि मैं अपने बच्चों के प्रति अपने प्रेम का प्रदर्शन इन रूढ़िवादी भारतीय समाज में वर्षों से सार्वजनिक रूप से उनका चुम्बन लेकर करता आ रहा हूँ। इसमें मुझे कुछ भी फूहड़ नज़र नहीं आया। न ही आज तक किसी ने मेरे इस प्रेम प्रदर्शन का कहीं भी विरोध किया।
Unlike5DeleteSunday at 1:07pm

Sunil Kumar Barnwal 2009 में न्‍यूजविक पत्रिका में एक सर्वेक्षण छपा, जिसमें यह बताया गया कि अमेरिकी युवा तेजी से हिंदू धर्म की ओर अग्रसर हो रहे हैं। बोस्‍टन विश्‍वविद्यालय के धर्म के प्रोफेसर स्‍टीफन प्रोथरो ने लिखा अमेरिकन लोगों का झुकाव हिंदुत्‍व की भावना के अनुरूप होता जा रहा है। इसे अमेरिका में 'देवी-सह कैफिटेरिया' का नाम दिया गया। इससे एक वर्ष पूर्व 2008 में किए गए 'हैरिस जनमत सर्वेक्षण' के अनुसार, 24 फीसदी अमेरिकी हिंदू धर्म के मूल में स्थित पूनर्जन्‍म पर विश्‍वास करने लगे हैं। 'मौत के बाद क्‍या' का सवाल अमेरिकी युवाओं को मथ रहा है और वह हिंदू धर्म के अनुरूप मृत्‍यु के बाद अपने शरीर को जलाने के लिए अपने परिजन से कहने लगे हैं। मोक्ष की तलाश ने उन्‍हें हिंदू धर्म से जोड़ दिया है।

दूसरी तरफ आप दिल्‍ली में आज सड़क पर रतिक्रिया का प्रदर्शन कर रहे युवाओं को देखिए, एक के भी चेहरे पर न तेज दिखता है, न आंखों में शांति है, न व्‍यक्तित्‍व में सौंदर्य है। दरअसल जिस तरह की आपकी सोच, आपके कर्म और आपकी भावनाएं रहेंंगी, आपका चेहरा, आपकी आंखें, आपका व्‍यक्तित्‍व उसी के अनुरूप ढ़लता चला जाता है।
Unlike1DeleteSunday at 1:07pm

Omkar Seth मुझे याद है मेरी दादी ने अपने पूरे जीवन में फोटो नहीं खिंचवाई.. गाँव में उनकी उम्र के किसी बुजुर्ग ने नहीं खिंचाई थी। कहते थे कि फोटो तो मुर्दों की टांगी जाती है.. वो सही कहती थी.. पर आज उन्ही दादीयों के बच्चे सेल्फ़ी खींच रहे हैं फेसबुक एल्बम सजा रहे हैं। वक्त है.. बदलना उसका धर्म है और उस बदलाव को निभाना हमारा धर्म। जो वक्त के साथ नहीं बदले उन्हें ही आज हम तालिबान, बजरंग दल, खाप आदि अलग अलग नामों से पहचानते हैं। इस बजरंग दल के कर्मचारी भी वही लोग हैं जो जबरन समाज को वापस 15वी सदी में ले जाना चाहते हैं.. ठीक वैसे ही जैसे तालिबानी हमें 6वीं सदी में ले जाना चाहते हैं। ऐसे लोग या तो खुद मिटेंगे या जल्दी ही मिटा दिए जाएंगे। वैसे अभिव्यक्ति और असामाजिक तत्वों के विरोध में फर्क होता है.. यह अभिव्यक्ति नहीं विरोध है कुछ असामाजिक तत्वों का। आप तरीके के बजाय मंतव्य पर बहस करें तो शायद परिणाम अधिक सार्थक हों।
Unlike4DeleteSunday at 1:07pm

Gaurav Rajasthan Ka किसी के भी प्रति ??? असहमत. भाव क्या है इस पर निर्भर हैं
Unlike1DeleteSunday at 2:33pm

Ali Syed DeepChand Pandey जी, की 'मिसाल' आपकी प्रविष्टि का जबाब एक नए ढंग से देती है कि अगर उभयपक्ष 'स्थिति' से संतुष्ट हों तो फिर सौंदर्य या फूहड़ता का तर्क देखने वाले की नज़र / मानसिकता तक सीमित है ! कहने का आशय यह है कि चुंबन को हमेशा सहवास के अंग के तौर पर क्यों देखा जाए ? पिता पुत्री, माता पुत्र, भाई बहन, प्रेमी प्रेमिका या पति पत्नी के रिश्तों को सुनिश्चित करने / पर सवाल उठाने वाले हम होते कौन हैं ? और उनकी निजता या सार्वजनिक स्थलीय अभिव्यक्तियों की फूहड़ता / सौंदर्य को क्यों ना उनके ही विवेक पर छोड़ दिया जाये ! प्रवीण 'सुनिये मेरी भी' साहिब
EditedUnlike4DeleteSunday at 3:55pm

Ashish Shrivastava Omkar जी, आपने मेरी सोच को सही शब्द दिये है...
Unlike2DeleteSunday at 4:24pm

प्रवीण 'सुनिये मेरी भी' मेरे विचार से थोड़ी भ्रम की स्थिति बन रही है, स्पष्ट कर दूँ, यहाँ स्त्री-पुरुष, स्त्री-स्त्री व पुरुष-पुरुष के प्रेम की बात कर रहा हूँ मैं, वैसे भी पिता-पुत्री, माता-पुत्र के चुम्बन में मात्र एक peck सा होता है, lip locking जो मीडिया में दिखी है कल, वह नहीं।
Like1MoreSunday at 7:00pm

Sunil Kumar Barnwal जी अभी तो फूहड़ ही लगेगा क्यू की हमने सीखा नहीं न ,हाँ हो सकता है ये सब देखते देखते कुछ दिन भृकुटि तनेगी फिर इग्नोर करेंगे अंतिम में हमारे संस्कृति का हिस्सा बन जायेंगे।
Unlike3DeleteSunday at 7:06pm

Ali Syed "किसी के प्रति अपने प्रेम को अभिव्यक्त करने'' अगर कोई भ्रम है तो उसके लिए आपके स्टेट्स का वाक्य विन्यास कुसूरवार है ! हमारी समझ में ''किसी के प्रति'' में सारे ही शामिल होते हैं ,ना कि चुन चुन के जैसा कि अब आप कह रहे हैं   प्रवीण 'सुनिये मेरी भी' साहिब
Unlike2DeleteSunday at 7:35pm

प्रवीण 'सुनिये मेरी भी' जी Ali Syed साहब, सुधारे दे रहा हूँ... 
LikeMoreSunday at 8:56pm

Vivek Chouksey ‪#‎BreakingNews‬
अपुष्ट सूत्रों के अनुसार अगले सप्ताह जामा मस्जिद और देवबंद सहारनपुर के सामने "बिकिनी महोत्सव" आयोजित होने जा रहा है. इसका मकसद बुर्के का विरोध करना तथा बुखारी के बिकिनी विरोधी बयान का विरोध करना है. पोलित ब्यूरो के एक सदस्य का कहना है कि जिस प्रकार हम घूँघट का विरोध करते हैं, उसी प्रकार हम बुर्के का भी विरोध करते हैं, हम अपनी मुस्लिम बहनों की आज़ादी और मानवाधिकार को लेकर भी उतने ही चिंतित हैं, जितने सार्वजनिक "Kiss" को लेकर. इसीलिए गत सप्ताह झंडेवालान संघ कार्यालय की ही तरह, प्रतीकात्मक रूप से इस बिकनी मार्च हेतु जामा मस्जिद एवं देवबंद का चुनाव किया गया है.
सभी "प्रगतिशील", "जनवादी", "सर्वहारा" वामपंथी बहनें(?) उस दिन इस "इस्लामिक मोरल पुलिसिंग" के खिलाफ, जामा मस्जिद से लाल किले तक बिकिनी में परेड करेंगी. वामपंथी युवाओं से लाल चड्डी में आने को कहा गया है, परन्तु उनकी लाल चड्डी हनुमान जी जैसी नहीं होनी चाहिए (साम्प्रदायिकता का विरोध है) तथा Jockey कंपनी की भी नहीं होनी चाहिए (क्योंकि वामपंथ बहुराष्ट्रीय कंपनियों का भी विरोध करता है)... इस प्रस्तावित "बिकिनी मार्च" को पश्चिम बंगाल और केरल की कई संस्थाओं ने समर्थन दिया है... जबकि प्रायोजक है JNU.
पोलित ब्यूरो के सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, कि बार-बार उन पर "एकतरफा सेकुलरिज़्म" के आरोप लगते रहते हैं, अतः जामा मस्जिद के सामने होने वाले इस विशाल बिकनी मार्च से, वे संघियों को मुंहतोड़ जवाब देना चाहते हैं.
Unlike3DeleteSunday at 9:08pm

Niroj Kumar विवेक जी ये इनके एजेंडे में न है ..भ्रम की स्तिथि पैदा न करें प्लीज ...कामरेड के किये कराए पे पानी तो बिलकुल भी न फेरें .....
Unlike3DeleteSunday at 9:13pm

हंसराज सुज्ञ ये वाममार्गी अपने पांच 'म'कारों को निश्चित ही सही सिद्ध कर के ही मानेगे। जोरदार कहा Vivek Chouksey जी।
EditedLike1DeleteSunday at 11:09pm
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