रविवार, 19 अक्टूबर 2014

'शीर्षक विहीन'

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असल आपत्ति थी
और विरोध भी तो
इस बात का ही था
कि आखिर क्यों किसकर
किसी पुरानी लड़ाई
में जीतने वाले को
बना दिया गया है
सर्वगुण सम्पन्न देवता
उसे पूजते हैं लोग
भव्य मंदिर बनाकर

उसी पुरानी लड़ाई में
हारने वाले योद्धा को
कह दिया जाता है असुर
हर बुराई से लदा-भरा
और उसकी उस मौत का
होता है सार्वजनिक उत्सव
लोग त्यौहार मनाते हैं

तुम जो अपने को कहते हो
इन्सान एक नई सोच का

तुम्हें विरोध करना था
दो महान योद्धाओं में
एक को महान-भगवान
बनाकर मन्दिर में पूजने
दूसरे को तुच्छ-अवगुण खान
बोल हिकारत से उपहास बनाने
की इस आदिम-जाहिल प्रवृत्ति का

पर तुम कर क्या रहे हो दोस्त
तुम हारे को देवता बना रहे हो
कल तुम उसी हारे का बनाओगे
अपने साधन जुटाकर मन्दिर भी
फिर तुम भी एक दिन आखिर
अपने देवता को पूजने लगोगे
और उसे हराने वाले को
कहोगे दुष्ट-भ्रष्ट, व्यभिचारी
इस बात को पुष्ट करने को
गढ़ोगे तुम भी मिथक नये
तुम भी प्रार्थनाएं रचोगे
तुम भी शीश नवाओगे
तुम भी भक्त बन जाओगे

और इन्सान के जिन कदमों को
आगे और आगे बढ़ना था
जो बढ़ने के लिये ही बने थे
वो एक तरह से ठहर जायेंगे
गोल घेरा है पुराना बना हुआ
वो कदम वहीं चक्कर लगायेंगे

दोस्त, मुझे अफ़सोस केवल इतना है
कि गोल घेरे में घूमते यह कदम
तुम्हारे हैं, तुम जो, अपने को कहते हो
इन्सान एक एकदम नई सोच का
तुम, जिस पर सबकी उम्मीदें थी
कि इस गोल घेरे को तोड़ डालोगे

दिल पर हाथ रख बोलो दोस्त
क्या इसे ही आगे बढ़ना कहते हैं?



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